सरई पानी—
पहाड़ी ढलान पर उलटा हुआ,
खोखला-सा तालाब,
जिसमें तिरछी पीली धूप चिलचिलाती
किनारों को करीने से
सफेद कास घेरती जाती
चढ़ाई पे तैनात
खड़े थे सरई के बूढ़े झाड़
, उठते काले तने ,
जो आसमान को छू कर
घनी हरी छतरी से छितराते
यूंही,,,
उन्हीं ऊंची फुंनगियों का कोकड़ा
लंबी कलारी-सी चोंच वाला,
रह-रह कर जब चीखता
नीचे पानी बग़राते बगुले
और लुढ़कते लंगूर
बेकारन ही चौकन्ने हो जाते।
हवा यहाँ मिट्टी से सांस सोखकर
आहिस्ते-आहिस्ते पत्तों को सरसराती,
और ढेरों मोटे झींगुर
गुनगुनाने लगते।
कुछ महीने पहले ही
मैकाले की लंबी पहाड़ियों को लांघ कर
वो युवा बाघिन
यहाँ आ कर रुकी।
रेतीली चट्टान पर झट से कूदी—
की मोर झन्ना गए,
भूरे सांभर खुरो से खोदने लगे माटी
और जंगल में
एक अजब-सा ओपेरा गूँजने लगा।
सभी शामिल थे—
लंगूर भी।
लंबी पूँछ वाली भृंगराज
तान भरने लगी,
जादुई, आदिम स्वर-लहरियाँ।
बाघिन ने असंतोष जताया,
चट्टान पर काबिज़ हो गई।
हल्की गुरगुराहट,
और उसकी लहराती पूँछ से
किनारे उगी सफ़ेद कास
हिलने लगी।
तीन चिंतकबरे शावक—
नौसिखिए कहीं के—
हिलती पूँछ से खेलते रहे।
सब कुछ ठहर गया,
पर पतंगों ने
भिनभिनाना नहीं छोड़ा।
खेंदरा बैगा भी भिनभिना रहा था
आख़िरकार पड़वा मिल ही गया
नाखूनों से फाड़ कर खोखला,
फटी आंखे बुझ गई थी
छाती की पसलियाँ
बांस की खपच्ची-सी खुल गई थीं।
सूखे लहू पे लहराती
हरी मक्खियाँ
दूसरी बारी था यह।
गुस्से में उसने ठोक दी टँगिया
कर्रा के तने में
मुआवज़े का सरकारी चक्कर
उसने कन्हा सीखा।
यह तो जंगल की
पीढ़ियों की लड़ाई थी।
मालिक तय होना था
रीति तय थी—
कीटों का जहर
मांस में मल दो,
रात गए
वो बचा मांस खाने
आएगी जरूर।
फिर आज सरई पानी में छुपकर
उसने बाघिन के शावक देख लिए
तो आँखों में
तालाब का पानी उतर आया।
ढलान पर
चित्तीदार चीतल हिल रहे थे।
बाघिन दुबककर रेंगती गई—
सूखे पत्तों को भी सहलाते हुए,
आहिस्ते-आहिस्ते।
चीतल सूँघ तो रहे थे,
पर मानो वो
खुद का सौदा जंगल से
कर चुके थे।
उधर खेंदरा बैगा भी
कास घास की ओर
खामोशी से रेंग रहा था
एक और सौदा लेकर
शावक इस अबूझ खेल को
समझने की कोशिश में थे।
कुन्मुनाने लगे
थोड़ी देर पहले
बाघिन का दूध
घास पर बिखरकर
पनीर हो चुका था—
जो उसने
अपने शावकों को पिलाया था अभी अभी
परसा पत्ते के दोने में
बैगा उसे सहेज रहा था।
बेटे की धुंधली आंखे
बाघिन का दूध
ही इलाज होगा पक्का
बैगा भांप गया
उसने शावकों की आँखों से कहा
निश्चिंत रहो
सब भला है।
शायद शावक
मूक भाषा समझ भी पाए।
सरई पानी
अब तालाब कहा रहा—
एक घर हो गया है,,,,,
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