Wednesday, September 21, 2016

अब युद्ध ही निराकरण है,,नारा भारतीय प्रायद्वीप के उत्तर पश्चिम सीमा के लिये 2400 वर्ष् से गूंज रहा है,,,, उत्तर पश्चिमी सीमा के प्रांत मौर्य राष्ट्रवाद के लिये भी उतने ही अराजक थे जितना आज का कश्मीर,,एक संगठित राष्ट्र के रूप में जब जब भारत खड़ा हुआ,,अपनी भौगोलिक स्थिति और भिन्न सांस्कृतिक कलेवर में,,,हमेशा से ही ये हिस्सा हमारी विदेश नीति के लिये बड़ी चुनौती खड़ा करता रहा
             अशोक मोर्य के दौर में प्रारम्भ हुए सीमावर्ती विद्रोह विशाल मौर्य साम्राज्य को ध्वस्त कर् गये,,,गुप्त शासक चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की उत्तरपश्चिमी गड़तंत्रो  के खिलाफ युद्ध और विजय की नीति भी गुप्तों के पतन को नही रोक पाई,,,, राजपूत शासक पृथ्वीराज की पराजय किसी प्रेमकथा की बजाय अव्यवस्थित विदेश नीति की परिणीति थी,,,वंही आगे चल कर मुगलों को भी अपने कांधार अभियान की आक्रमक युद्ध नीति का ख़ास फायदा नही मिल पाया
                    

Friday, September 16, 2016

डाइस के उस पार ,,प्रजा है
तंत्र बना मैं औचक सा
भू संहिता से फूटी धारा
,,संग बहा मैं भौचक सा

खसरों को उगते देखा
रिश्तों संग बटते देखा
अंगूठे की नीली निशानी में
माँ का दूध  फटते देखा

आँशु भीगे आवेदन देखे
मुस्कुराते प्रतिवेदन देखे
नक्शों में नवभविष्य गढ़ते
दिल चीरते सीमांकन देखे

घांस जमीन अब घांसी की
जंगल जमीन जब बाँकी थी
पट्टो में गावँ बाट गया
खादी का खेल भी रोचक सा

डाइस के उस पार प्रजा है
इस पार खड़ा मैं औचक सा

अनुभव







Thursday, January 7, 2016

डकार

मेरे हिस्से बहार नही आती
डाँट खा कर डकार नही आती

काम कमबख्त कर्ज से बढ़ते
दिन उंघते ,नीद रात भर नही आती

बेइज्जती का हिसाब न कर अनुभव
इज्जत इस शहर किसी घर नही आती

Friday, January 1, 2016

नववर्ष

जाने कितने दिनों के बाद,,,, नववर्ष की पहली दुपहरी बिलकुल खुल कर बिताई ,, दोस्तों के साथ ,,,हरी घांस  पर बिछी चटाई ,,, कई हाथों के बिखरे जायके,,और गुनगुनी धुप छानती झुरमुटों के नीचे जबरजस्त गपशप ,,,,नदी खुद मैली हो रखी थी नही तो ख़्वाहिस डुबकी लगाने की भी थी ,, खैर,, ग्राम सेमरा के बाड़े में रात की खिचड़ी दावत ,, और पुते लिपे कमरों की बिखरी आदिम महक में मोहा गए ,,वाकई गावँ की परछी से बड़ा और हैपनिंग बैंकवेट हॉल कोई हो नही सकता,, सभी दोस्तों को धन्यवाद वर्ष की इस खूबसूरत शुरुवात के लिए,,,

Tuesday, August 25, 2015

जाति जाती नही ,,माथे पे दर्ज है
पितृ कर्ज का चुकारा ,,मेरा फर्ज है

Saturday, July 25, 2015

वैसे ही

वैसे ही ,,,,,
उस रोज वो डरा हुआ था कल की मीटिंग के आंकड़े पूरे नही थे ,,,इस लिए अपने दफ्तर में , बचे हुए काम देर रात खत्म कर रहा था ,,अचानक फिर बुरी तरह डर गया,,वो ,,,उसने उस कर्मचारी को देखा था ,,जो कुछ अरसे पहले ही मर चूका था,,,,बन्धी हुई  घिग्घी को तोड कर उसने पूछ  ही लिया ,,,बड़ी अजीब बात है कि तुम तो मर चुके हो,, शायद,,, मैंने सुना भी था ,,
             मरा हुआ आदमी मुस्कुराया ,,,बोला ,,हाँ मरा हुआ ही था,,,पर अब तो जिन्दा हु लगता है,,,,, उसकी घिग्घी कुछ और घुल गई  ,,मरने के बाद भी ,,ऐसा क्यू लगता है ,,,उसे परेशान देख कर मरा हुआ आदमी आगे बढ़ा ,,,देखो मैं जब जिन्दा था तब भी  मेरा परिवार खाना खाता था ,,आज भी खा ही लेता है वैसे ही ,,मेरे दोस्त आज भी महफिले सजा रहे है ,, और तुम आज भी मेरी मेज पर वैसे ही फाइले निपटा रहे हो ,वैसे ही,,सब कुछ वैसा ही तो है जैसे मैं जिन्दा था  ,,हाँ,कुछ चीजे जरूर बदल भी गई है पर फिर ये बदलाव भी एक दिन बदल ही जायेगा,,,वैसे ही,,
                      लेकिन फिर भी तुम तो नही हो न,,, वो बोला,,,,मरा हुआ आदमी परेशान सा दिखा,,,,हा नही  हु ,,,पर अब लगता है मैं तब भी कन्हा था,,,या फिर था भी तो जैसे आज हु ,,,,या फिर जैसे तुम हो,,,,आज मैं मर कर कुछ कर नही पाता ,,तुम भी ???  ,,,चीजे तो वैसे ही होती जाती है ,,,,,ये कहते हुए मरा हुआ आदमी मुस्कुराया ,,,,,उसने भी अब माथे का पसीना पोंछ लिया ,,,और फिर से एक नई फ़ाइल उठा ली,,,जैसे कह रहा हो  ठीक है,,,लेकिन मैं तो अभी जिन्दा ही हु,,,, भले ,,, वैसे ही
अनुभव ,,,,

Wednesday, July 22, 2015

डार्विन

डार्विन की थ्योरी सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट ,,भी न्यूटन के तीसरे नियम पे ख़तम होती है ,,क्रिया के बदले प्रतिक्रिया,,, हर एक श्रेस्ठ प्रजाति जो इस धरती पे राज करती है अपने अधिकतम विस्तार के पश्चाद् नष्ट हो जाती है डायनोसारस की भाँती ,,और फिर सबसे कमजोर जीव फैलते है बन्दरो से विकसित आज के मानव की तरह ,,,विकास को ही लें,,,अफ्रीका में बन्दर से मेधावी बन्दर होमोसेपीएन्स विकसित हुए ,,विकास का स्रोत अफ्रीका आज सबसे पिछड़ा छेत्र है ,,