Tuesday, November 14, 2017

सुन ले मोर गुरुजी ,,अब
सिरा गया है,,ए औ बी,,,
बांच गया है,,,सी औ डी
सी डी,,,,

मैकल  कल फिर आऊंगा
साल वृन्द सोहबत में
हरिन झुंड संग नृत्य करूँगा
सौफ बिछी कुदरत में



Saturday, October 28, 2017

कीड़े

कीड़े परेशान हैं
बढ़ रहे इंसान है
धरती के हर कोने में
कांक्रीट के मकान है

Wednesday, September 21, 2016

अब युद्ध ही निराकरण है,,नारा भारतीय प्रायद्वीप के उत्तर पश्चिम सीमा के लिये 2400 वर्ष् से गूंज रहा है,,,, उत्तर पश्चिमी सीमा के प्रांत मौर्य राष्ट्रवाद के लिये भी उतने ही अराजक थे जितना आज का कश्मीर,,एक संगठित राष्ट्र के रूप में जब जब भारत खड़ा हुआ,,अपनी भौगोलिक स्थिति और भिन्न सांस्कृतिक कलेवर में,,,हमेशा से ही ये हिस्सा हमारी विदेश नीति के लिये बड़ी चुनौती खड़ा करता रहा
             अशोक मोर्य के दौर में प्रारम्भ हुए सीमावर्ती विद्रोह विशाल मौर्य साम्राज्य को ध्वस्त कर् गये,,,गुप्त शासक चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की उत्तरपश्चिमी गड़तंत्रो  के खिलाफ युद्ध और विजय की नीति भी गुप्तों के पतन को नही रोक पाई,,,, राजपूत शासक पृथ्वीराज की पराजय किसी प्रेमकथा की बजाय अव्यवस्थित विदेश नीति की परिणीति थी,,,वंही आगे चल कर मुगलों को भी अपने कांधार अभियान की आक्रमक युद्ध नीति का ख़ास फायदा नही मिल पाया
                    

Friday, September 16, 2016

डाइस के उस पार ,,प्रजा है
तंत्र बना मैं औचक सा
भू संहिता से फूटी धारा
,,संग बहा मैं भौचक सा

खसरों को उगते देखा
रिश्तों संग बटते देखा
अंगूठे की नीली निशानी में
माँ का दूध  फटते देखा

आँशु भीगे आवेदन देखे
मुस्कुराते प्रतिवेदन देखे
नक्शों में नवभविष्य गढ़ते
दिल चीरते सीमांकन देखे

घांस जमीन अब घांसी की
जंगल जमीन जब बाँकी थी
पट्टो में गावँ बाट गया
खादी का खेल भी रोचक सा

डाइस के उस पार प्रजा है
इस पार खड़ा मैं औचक सा

अनुभव







Thursday, January 7, 2016

डकार

मेरे हिस्से बहार नही आती
डाँट खा कर डकार नही आती

काम कमबख्त कर्ज से बढ़ते
दिन उंघते ,नीद रात भर नही आती

बेइज्जती का हिसाब न कर अनुभव
इज्जत इस शहर किसी घर नही आती

Friday, January 1, 2016

नववर्ष

जाने कितने दिनों के बाद,,,, नववर्ष की पहली दुपहरी बिलकुल खुल कर बिताई ,, दोस्तों के साथ ,,,हरी घांस  पर बिछी चटाई ,,, कई हाथों के बिखरे जायके,,और गुनगुनी धुप छानती झुरमुटों के नीचे जबरजस्त गपशप ,,,,नदी खुद मैली हो रखी थी नही तो ख़्वाहिस डुबकी लगाने की भी थी ,, खैर,, ग्राम सेमरा के बाड़े में रात की खिचड़ी दावत ,, और पुते लिपे कमरों की बिखरी आदिम महक में मोहा गए ,,वाकई गावँ की परछी से बड़ा और हैपनिंग बैंकवेट हॉल कोई हो नही सकता,, सभी दोस्तों को धन्यवाद वर्ष की इस खूबसूरत शुरुवात के लिए,,,