Tuesday, January 20, 2015

दोराहे भूख के

दोराहे भूख के,,,,,
रात के दू बजा रिहा ,,,पत्ता मन के आवाज ले झकना के नींद उमचा ,,,जंगली हांथी ,,,दन्तेल ,,,,कच्ची ईंटा के दिवार को भरभरा के गिरा दिया,,,औ मेरा बाई का गोड़ झिक के उठा दिया ओल्लर ,,,ओकर सफ़ेद दांत दिखता रहा अंधियार में,,,,,,मैं अपना बेटी को धर के गाँव कोती भाग गया,,,,पाछू मेरा बाई को पटकने का आवाज आया ,,,औ चिंघाड़ ,,,,पागल हांथी का,,,,मैं चीखा ,,,तोला नै बचा पांहु ओ में हा लइका ल देखत हों,,,,,
                        अमरित जाति गोंड  उमर इक्कीस साल ,,निवासी छोटे लोरम ,,,कन्हिया में अपना तीन साल का बेटी पूनम को पाये हुए एक बार फिर सुबकने लगा  रात की घटना को याद कर ,,जो उसकी बेटी की आँखों में बरफ के जैसी जम गयी थी,,,पूनम बोली मेरा झोपड़ा को फोड़ दिया ,,हांथी,,,वो अभी भी नही जान रही थी की उस पागल दंतैल ने ,,उस रात उसकी माँ को पटक पटक कर ऐसी भयवाह मौत दी की आस पास के मैदान में चारो और उस ओरत के  चीथड़े बिगरे हुए थे,,, मृत शरीर के नाम पर था मांस का एक लोथड़ा,,,,
मद मस्त हांथी पहले भी लोगो को मारते रहे है पर इतनी वीभत्सता से,,मानो किसी बाघ ने शिकार को चीर डाला हो,,   गाव वालो का गुस्सा तो शासकीय मुवावजे की राशि से  कुछ ठंडा सा गया  ,,पर अब उस गजराज का भय  लोगो को थरथरा रहा था,,, पागल जंगली हांथी
             खेत से लगा जंगल और फिर चारो ओर से घेरती हुई पहाड़ी ,,उस पार ओडिसा ,,,,हांथी इस रस्ते से हमेशा से ही गुजरते है ,,, जुने जंगली रास्ते ,,अब कटने लगे है ,,,क्यूँ कर के,,,,,,हांथी मद में पागल हो कर पूरा जंगल उजाड़ते गुजरते है पर उस रात तो किसी भी झाड़ की डंग़ालि नही टूटी थी,,, ये जरूर था की  साजा के कटे हुए कुछ पेड़ उस खाली नए बने खेत में कटे हुए पड़े थे ,,जन्हा उस रात अमरित का परिवार सोया था ,,नए बने खेतो के बीच,,,गाव वाले कहते है वन पट्टा मिला था,,,हांथी के पास कोई शासकीय पट्टा तो नही होगा ,,थी तो बस,,, भूख ,,और उससे जुड़ा वो जूना रस्ता,,,,जिस पर अमरित को पट्टा मिल गया था,,,अपने परिवार की भूख मिटाने वो जो खेत बना रहा था,,,और उस रस्ते से हांथी की भी भूख गुजरती थी ,,,,हजारो हजारो सालो से भूख मिटाते रस्ते  ,,,इस भूख के दोराहे पे ही उस रात पागलपन बरसा ,,,
अनुभव

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