दोराहे भूख के,,,,,
रात के दू बजा रिहा ,,,पत्ता मन के आवाज ले झकना के नींद उमचा ,,,जंगली हांथी ,,,दन्तेल ,,,,कच्ची ईंटा के दिवार को भरभरा के गिरा दिया,,,औ मेरा बाई का गोड़ झिक के उठा दिया ओल्लर ,,,ओकर सफ़ेद दांत दिखता रहा अंधियार में,,,,,,मैं अपना बेटी को धर के गाँव कोती भाग गया,,,,पाछू मेरा बाई को पटकने का आवाज आया ,,,औ चिंघाड़ ,,,,पागल हांथी का,,,,मैं चीखा ,,,तोला नै बचा पांहु ओ में हा लइका ल देखत हों,,,,,
अमरित जाति गोंड उमर इक्कीस साल ,,निवासी छोटे लोरम ,,,कन्हिया में अपना तीन साल का बेटी पूनम को पाये हुए एक बार फिर सुबकने लगा रात की घटना को याद कर ,,जो उसकी बेटी की आँखों में बरफ के जैसी जम गयी थी,,,पूनम बोली मेरा झोपड़ा को फोड़ दिया ,,हांथी,,,वो अभी भी नही जान रही थी की उस पागल दंतैल ने ,,उस रात उसकी माँ को पटक पटक कर ऐसी भयवाह मौत दी की आस पास के मैदान में चारो और उस ओरत के चीथड़े बिगरे हुए थे,,, मृत शरीर के नाम पर था मांस का एक लोथड़ा,,,,
मद मस्त हांथी पहले भी लोगो को मारते रहे है पर इतनी वीभत्सता से,,मानो किसी बाघ ने शिकार को चीर डाला हो,, गाव वालो का गुस्सा तो शासकीय मुवावजे की राशि से कुछ ठंडा सा गया ,,पर अब उस गजराज का भय लोगो को थरथरा रहा था,,, पागल जंगली हांथी
खेत से लगा जंगल और फिर चारो ओर से घेरती हुई पहाड़ी ,,उस पार ओडिसा ,,,,हांथी इस रस्ते से हमेशा से ही गुजरते है ,,, जुने जंगली रास्ते ,,अब कटने लगे है ,,,क्यूँ कर के,,,,,,हांथी मद में पागल हो कर पूरा जंगल उजाड़ते गुजरते है पर उस रात तो किसी भी झाड़ की डंग़ालि नही टूटी थी,,, ये जरूर था की साजा के कटे हुए कुछ पेड़ उस खाली नए बने खेत में कटे हुए पड़े थे ,,जन्हा उस रात अमरित का परिवार सोया था ,,नए बने खेतो के बीच,,,गाव वाले कहते है वन पट्टा मिला था,,,हांथी के पास कोई शासकीय पट्टा तो नही होगा ,,थी तो बस,,, भूख ,,और उससे जुड़ा वो जूना रस्ता,,,,जिस पर अमरित को पट्टा मिल गया था,,,अपने परिवार की भूख मिटाने वो जो खेत बना रहा था,,,और उस रस्ते से हांथी की भी भूख गुजरती थी ,,,,हजारो हजारो सालो से भूख मिटाते रस्ते ,,,इस भूख के दोराहे पे ही उस रात पागलपन बरसा ,,,
अनुभव
Tuesday, January 20, 2015
दोराहे भूख के
Monday, December 22, 2014
करिया धुरवा
कौण्डिया .,एक कोती खेत और दूसर कोती दूर तक फैला हुआ डोंगरी ,,औ दुनो बीच पे पिचकाय गाँव कौड़िया,, ,मिटटी के बिखरा हुआ झोपड़ा मन को बरगद नीम लील रहा है, गाव का एक ओर चौहद्दी में फैला है बलुआ पथरा का किला बन्दी,, दूसर कोती बाघ नाला और चारो मुड़ा बिखरा हुआ है खण्डहर जो अपना नायक राजा करिया धुरवा की कहानी ख़ुसफुसाता है,,ओ राजा रे राजा धुरवा,,,,ओ ओ ओ ओ!!!
सौ युद्ध का अपराजित गोंड नायक .....यन्ही कोडिया मे हजार भर की सेना चारो ओर ले घेर दिया..औ करिया कर केवल दस मनखे..फेर करिया डिगा नही कौण्डिया छोड़ा नही ,,..दे..खेंचा धनुस,, औ निकलता तीर..सांय सांय ,,,,तो दू कोष तक ले जान दे ... एक तीर से पांच मनखे बेध देता रहा...एक पहर में पूरा चौरङ्गी सेना साफ़....ऐसे बनी बारह गढ़ वाली कौण्डिया जमीदारी ओ उसका वेभव,,,,
फेर समय तो घुचकता ही है...हमार दादा के आत ले पूरा राज पाट सिरा गया ,,,,गोपाल साय महुआ के झोंक में हाथ फैला के बोले,,,कभू येह सारा खेत हमारा रहा,,,और अब,,,तो फिर जान दो,,,,जुन्ना तीर तलवार सब बेंच गया,,,बांच गया है ये कबर राजा का ,,,,,,,पर करिया धुरवा के इस वारिस राजा का कबर भी कोई खोद दिया,,,गोपाल साय का कहना है,,, हमारा दादा खुदे कबर खोद के निकल गया,,,जगनाथ पूरी जाय बर,,अपना वंसज मन का दुर्दशा नही देख पाया,,पैर का चीन्हा मिला था उही दिशा में,,,,पर गाँव वाले तो कुछ औ कहानी कहते है,,,,यही मन एक रात खान दिन गा ,,,हीरा पन्ना जेवरात पाये बर ,,औ का,,,,,,,,सौ युद्ध का बिजेता का सम्मान अपन वंसज मन ले हार गया ,,,,,,फेर सिराया नही,,आज भी कौण्डिया खुसफुसा रहा है,,ओ राजा धुरवा,,ओ ओ ओ ,,,
अनुभव
Saturday, December 20, 2014
माल
एति मॉल ओति माल
जिन्हा जाबे तेती माल
जम्मो शहर हा माले माल हो गे
ऐला बिसा फेर ओला बिसा
येला खवा अऊ ओला खवा
साले कमैया के जी के काल होगे
अनुभव
Friday, December 19, 2014
चुनाव होता तो है लोकतंत्र का महा उतस्व ..फेर मोहल्ला का पार्षद चुनाव...मने समुद्र मंथन ...इस पंच वर्षीय प्रक्रिया में खालहे में बैठा सबो किसम का खादा उफ्ला जाता है ...भाँती भाँती के जमीनी नेता अंकुरित हो जाता है .. बल्लू के टिकिस पक्का हे ...सीधा दिल्ली ले....कौन बल्लू रे ...काका अपना टेटका बल्लू ...शराबी ...काका ये दारी तोर आखिरी मतदान हे
Thursday, October 9, 2014
महेश गुरूजी
कोन हंसा रे ..महेश गुरूजी
पुराना टाइम में आदमी का गिना चुना नाम प्रचलित रहा..उही रमेश महेश सोहन मोहन..सो उपनाम पहिचान के लिए बड़ा जरुरी था ..जैसे रेचका मुन्ना ..कोंदा मुन्ना ..बडा मुन्ना ..यंही ले कामेडी आफ एरर जनमता था...
हमारे नगरपालिका स्कुल में दो महेश एक ही किलास में विराजते थे एक था एकदम अंतिम कोने के अंधियार में गुम हो जाने वाला करिया महेश औ दूसरा पूरी कक्छा का एक चौथाई जगह घेरता हुआ कोंहड़ा जैसे मुड़ी वाला बोड्डा महेश...पहला श्वान गुणों से भरपूर पूरी किलास को चिमट्ता खजुवाता दो दूसरा गाय कस लथर कर केवल मक्खी भगाता बैठा रहता.. ,एक दारी सम्भल लाल गुरूजी दुनो गोड को टेबल में चेप के.. मार गोल्लर कस खर्राटा मार रहे थे..येतका में बाजू के चरोटा भांटा ले बस्साता लू का थपेड़ा कमरा में प्रवेश मारा औ दीवार पे लटका महापुरुष का फोटू हिलना शुरू...कक्छा के अधियार में बत्तीस दांत चिमक गया..वाहा दे नेहरु जी नाचत हे ..करिया महेश हंस पड़ा..इहिहिहिहीहीहीही...सत्ताईस किसम की बिचित्र हंसी..फेर करिया महेश के हंसी के तारत्व से गुरूजी की तन्द्रा भंग हो गयी...
कोन हान्सिस बे ...पूरा किलास से एक स्वर उभरा...महेश...ढीला पड़ा नाडा को कसते हुए..गुरूजी पहले महेश तक पहुच गये ...और उसके झुठहा चुंदी की जड़ों को छरिया छरिया के पीठ पे मुठ्का प्रहार शुरू कर दिए...जब पूरा गुस्सा उतर गया तब ही गुरूजी उपर उठे...लेकिन तभी एक कर्ण भेदी भोंगरा आवाज ले पूरा स्कूल गूंज गया...ऒऒऒऒऒऒऒऒऒन..महेश टोटा फाड़ रहा था...क्या हुआ बे चूतिया ..पहिले तो खूब हंस रहा था...महेश अपने बोहाते नाक और सिसकी पे काबू करते हुए बोला...मै कन्हा हंसा गुरूजी ..मै तो बोड्डा महेश हूँ ...करिया महेश हंसा रहा...लेकिन तब तक गुरूजी का हाथ मुह ललिया गया था..सांस थामते हुए बोले ..साला पहिले काबर नही बोला...चल कोई बात नही चुप हो जा...
ऐसे ही प्रति दिन करिया महेश की प्रत्येक गलती पे पूरा किलास चील्लाता ...महेश किया..औ बोड्डा महेश पिट जाता..अन्ततह बोड्डा महेश ने इस रोज की प्रतारणा के अंत की तरकीब सोंची...परीक्छा के पेपर में गुरूजी के साल भर के मुटका के बदले ...छांट कर एक लोकप्रिय गाली ..उत्तर पुस्तिका में लिख दी . बोड्डा फेल हो गया ..और करीया महेश चीट शास्त्र में पारंगत होने के कारण पास...बोड्डा अब ख़ुश था..लेकिन ये ख़ुशी भी साली फुर्र हो गयी जब फिर से किलास चौंथी में बैठे हुए उसे जानकारी हुई की एक और महेश उसी के कक्छा में एडमिशन लिया है ...खेखड़ी महेश...कोन चिल्लाया रे ...महेश गुरूजी..भद भद
अनुभव
Saturday, October 4, 2014
शेर सिंग
शेर सिंग
बर झाड के झुरमुट ले नाम परा बार... नौ गोंड परिवार वाला' गाव' नवापारा ..औ ये दुनो जुड़वाँ गाव को चारो ओर ले घेरे....बारनवापारा अभ्यारण्य ..फेर लोग कहते है लुवाठ जंगल ....बिना शेर के सुक्खा जंगल ...मोर बेंदरा औ हरिन देखने कोई जाता है जंगल...? लेकिन गावं वाला ये बात नही मनाता... कोन कहता है शेर नही है देवपुर घाट में बाघ पंजा का छापा फोकट में मिला था ...
सही बात तो है कि कभी ये गाव शेर के दहाड़ ले कपकपाता रहा..फिर वो रात जब शिकारी आया तो पूरा गाव तीमारदारी में जुट गया.. पेड़ उप्पर मचान बंधा...ओउ खाल्हे में बंधा भैंसा पडवा ...माँआआअमाँ ......पडवा नरियाता ..ओ दुरिया ले सुक्खा पत्ता मन चरचराता ..मम्हाता बिसरैन गंध .. अंधियार में चिमकता दू आंखी ..बग्ग ले....आन दे और आन दे..फेर बीस हाँथ दूर ले गूंजता गया डबल बेरल ...धान्य धान्य...औ सुतता ऊँघाता साल सेगोन को जैसे कोई झकना के जगा दिया हो..हिल गया पूरा जंगल...पोटा कम्पाता हुआ ओ दहाड़ ले..
बिहिनिया गये गाव में खटिया सजा ... रात भर के शिकार बाघ मन का कतार लग गया..पूरा गाव इकट्टा होके ताक रहा है ..ये हे बन्ड़ा .. परसा पाली तीर मोर बछिया ल उठाया रहा ..ओ उसका पिला होगा....खटिया में बैठे शुकुल जी अपना दू नाली साफ़ करते .हुए.. ठाकुर ले पूछते है ,,ये आदमी काहे भाग रहा है रे ..एकर लरका हुआ है भैया आजेच...नरवा काटे खातिर औजार ले बर जाता है ..ऐसा... बोलो इसको अपने बेटा का नाम शेर सिंग ही रखे....लकी फेलो ...एक रात में बारह शेर मारे.....शुकुल जी ने नामकरण कर दिया
....पूरा गाव कहता है ये कहानी... मुख्य मंत्री का बेटा धरा है इसका नाम ..शेर सिंग ...और आज का शेर सिंग साठ साल का डोकरा.है...गावं के लईका लोगो को ये कहानी बार बार सुनाता है ...कहता है...जेन दिन ये शेर सिंग जनमा..ओ दिन ले जंगल में शेर नही दिखा... शेर होगा जरुर ...फेर अब दिखेगा काहे...डर्राता होगा कंही फेर,,, कोई किसी लइका का नाम शेर सिंग झन धर दे...
अनुभव
Friday, September 26, 2014
फ़िस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स
......फ़िस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स..
करक का सूरज मुड़ी उपर दे भभका मार रहा है...टप्प टप्प .टप्प..निथरता... पसीना ..फीरंता सांवरा का ..माथा में बंधे साफा ले बोहा बोहा के नदिया नारा कस पूरा शरीर भर फ़ैल गया....फ़िस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स...बीला भीतरी ले मार फुफकारा ..... करिया डोमी .. फन छाता कस तान दिया..धूप में चमकता छाता फन ....फ़िस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स...फिरंता दुनो डाहर ले हाथ को घुमा रहा है .डोमी का करिया आंखी बोक बोक घूरता है..ओऊ ओती डोमी घुमा की.... सट ले फन को दबोचा ..फिरंता......डोरी कस घूमता पूंछी को दूसरा कोती ले धर के झोला में भीतराया ही था ..के ....फ़िस्स्स्स्स...झोला के कपड़ा में सांप का दंस ...सुनहरा बुन्द हाथ उपर छटका गया ...पसीना उपर चिमकता...अमरित....
अमरित ही तो है ...बुढा देव ...भोला बाबा का अशीष....सांप का पेट भरता है सो फिरंता का ..ऐसे ही पूरा सांवरा डेरा का भी...इहि अमरित....सपेरा जाति सांवरा मनखे के झोपड़ा में ,मनखे कम ,सांप जियादा....किसम किसम का सांप ...अहिराज ..घोरा किरैत...मुसलेंडी....ओउ राजा डोमी........ डेरा भर का मनखे ...कंधा में कांवर बोहे ...दुनो कोती चार चार पिटारा टाँगे...किन्जरता है ...ये गाँव ले वोओ गाँव ...धायं रीयपुर धायं दुरुग ....
चौक ठेला देख के जम गिया पिटारा....अचरज ले बोकाय आंखी का घेरा...वो वाला दिखाओ जी..इसका जिहर नै निकाला है साहेब ..बस्तर के जंगल से तीन दिन पाछू पकड़ा.. करंच नाग ...जय हो नाग देवता..जागो ..ढकना हटा ही ..के फिस्स ले फिरंता के हाथ में डस दिया डोमी... ये दे मार दिया...न...फिरंता हाथ घुमाता है लाल लाल दू निशान..झट ले लाल पुडिया खोला ...भीतर में सफेद फिरोजी रंग का गरूर बूटी ले के घाव में चेपक दिया ओउ मारा मन्तर.....बूटी टिपक गया...ओ उतर गया जिहर....अचूक इलाज....वा... वा. टीन्न्न्न्न ले पच्चीस ..पच्चास पैसा सिक्का उछल उछल के सांप के देन्हे में पड़ता है...गुलाल इगरबत्ति...दुध...नरियर का चढावा..ओउ.पांच सौ रूपया गरूर बूटी...जिहर का अचूक दवा....ले सौ दे दे महराज..तोर बर....
आस पास गाव बेडा ले मनखे यंही आता है ..सावरा बेडा....जिल्ला अस्पताल छोड़ के.....प्राण बचने का गरंटी....कोई सांप काटे...बस उही ठंडा देन्हे वापिस जाता है जिसका डेरा चौहद्दी तक सांस बांकी न रहे...नै तो ...संवरा के फुके पूरा दिन ले चढ़ा जिहर भी उतर जाए.....पर आज फिरंता सायकिल में बिठा के अपना छोटे लईका को जिल्ला इस्पताल लाया है....डाक्टर साहेब डोमी डस दिया है ...जल्दी इंजेक्शन लगा दो.....साहब....जल्दी कर न साहब..आंखी तेड्गात हे ..जिहर चघ रहा है..
डाक्टर पूछा ...क्यों रे सारा जमाँना भर को सावरा बस्ती मन्तर मारता है ...इसका भी जहर उत्तार लेते...काहे याद आया बे अब इंजेक्शन ....फिरंता के आंखी में पानी उतर गया....अब.का कंहू साहब सब पेट का खेल है... ...सबो सांप जहरीला इहि मान के आता है मनखे ... जो फूंक के उतरता है .... वो है मन का डर...फेर जिहर .....नाग के जहर दांत तोड़ दे ..तो औ बात ....जिहर तो भोला बाबा के अमरित हे .अचूक... जो कभू लहू में चढ़ गिया तो सांस ही लील देता है....सब जन्तर मन्तर फेल....पर का करबे साहब बेडा भर का रसोई चलाता है ये जिहर का डर.. अब एके लइका है कई के बेडा भर से लड़ के ले आया हु बचाना है तो बचा लो ...फेर ये मन्तर किसी पे झन खोलना...साहेब
अनुभव