Wednesday, January 7, 2026

सरई पानी



सरई पानी—
पहाड़ी ढलान पर उलटा हुआ,
खोखला-सा तालाब,
जिसमें तिरछी पीली धूप
चिलचिलाती हुई
किनारों को करीने से
सफ़ेद कास में घेरती जाती।
चढ़ाई पर तैनात
खड़े थे सरई के बूढ़े झाड़—
उठते काले तने,
जो आसमान को छूकर
घनी हरी छतरियों में
छितरा जाते,
यूं ही।
उन्हीं ऊँची फुनगियों पर
कोकड़ा—
लंबी कलारी-सी चोंच वाला—
रह-रह कर जब चीखता,
नीचे पानी बग़राते बगुले
और लुढ़कते लंगूर
बेकारन ही चौकन्ने हो जाते।
हवा यहाँ
मिट्टी से साँस सोखकर
आहिस्ते-आहिस्ते
पत्तों को सरसराती,
और ढेरों मोटे झींगुर
गुनगुनाने लगते।
कुछ महीने पहले ही
मैकाले की लंबी पहाड़ियों को लाँघकर
वह युवा बाघिन
यहाँ आकर रुकी थी।
रेतीली चट्टान पर
झट से कूदी—
मोर झन्ना गए,
भूरे सांभर
खुरों से माटी खोदने लगे,
और जंगल में
एक अजब-सा ओपेरा
गूँज उठा।
सभी शामिल थे—
लंगूर भी।
लंबी पूँछ वाली भृंगराज
तान भरने लगी—
जादुई, आदिम
स्वर-लहरियाँ।
बाघिन ने असंतोष जताया,
चट्टान पर काबिज़ हो गई।
हल्की गुरगुराहट,
और उसकी लहराती पूँछ से
किनारे उगी सफ़ेद कास
हिलने लगी। 
तीन चिंतकबरे शावक—
नौसिखिए कहीं के—
हिलती पूँछ से खेलते रहे।
सब कुछ ठहर गया,
पर पतंगों ने
भिनभिनाना नहीं छोड़ा।
जंतरी गुनिया भी
भिनभिना रहा था।
आख़िरकार पड़वा मिल ही गया—
नाखूनों से फाड़ा हुआ,
खोखला।
फटी आँखें बुझ चुकी थीं,
छाती की पसलियाँ
बाँस की खपच्चियों-सी
खुली पड़ी थीं।
सूखे लहू पर
हरी मक्खियाँ
लहराती रहीं।
दूसरी बारी था यह।
गुस्से में
उसने टँगिया ठोक दी
कर्रा के तने में।
मुआवज़े का सरकारी चक्कर
उसने कभी नहीं सीखा।
यह तो जंगल की
पीढ़ियों पुरानी लड़ाई थी।
मालिक तय होना था।
रीति तय थी—
कीटों का ज़हर
मांस में मल दो,
रात गए
वह बचा मांस खाने
आएगी जरूर
आज सरई पानी में
छुपकर
जब उसने बाघिन के शावक देख लिए,
तो आँखों में
तालाब का पानी
उतर आया।
ढलान पर
चित्तीदार चीतल हिल रहे थे।
बाघिन दुबककर रेंगती गई—
सूखे पत्तों को भी
सहलाते हुए,
आहिस्ते-आहिस्ते।
चीतल सूँघ तो रहे थे,
पर मानो
उन्होंने खुद का सौदा
जंगल से कर लिया हो।
उधर जंतरी गुनिया भी
कास घास की ओर
ख़ामोशी से रेंग रहा था—
एक और सौदा लेकर।
शावक इस अबूझ खेल को
समझने की कोशिश में
कुन्मुनाने लगे।
थोड़ी देर पहले
बाघिन का दूध
घास पर बिखरकर
पनीर-सा जम गया था—
जो उसने
अभी-अभी
अपने शावकों को पिलाया था।
परसा पत्ते के दोने में
गुनिया उसे सहेज रहा था।
बेटे की धुँधली आँखें—
बाघिन का दूध
ही इलाज होगा,
यह गुनिया
भाँप गया था।
उसने शावकों की आँखों से कहा—
निश्चिंत रहो,
सब भला है।
शायद शावक
मूक भाषा
समझ भी पाए।
सरई पानी
अब तालाब नहीं रहा—
वह तो एक घर है।

अनुभव 

सरई पानी



सरई पानी—
पहाड़ी ढलान पर उलटा हुआ,
खोखला-सा तालाब,
जिसमें तिरछी पीली धूप चिलचिलाती
किनारों को करीने से
सफेद कास घेरती जाती

चढ़ाई पे तैनात
खड़े थे सरई के बूढ़े झाड़
, उठते काले तने ,
जो आसमान को छू कर
घनी हरी छतरी से छितराते 
यूंही,,,
उन्हीं ऊंची फुंनगियों का कोकड़ा
लंबी कलारी-सी चोंच वाला,
रह-रह कर जब चीखता 
नीचे पानी बग़राते बगुले
और लुढ़कते  लंगूर
बेकारन ही चौकन्ने हो जाते।
हवा यहाँ मिट्टी से सांस सोखकर
आहिस्ते-आहिस्ते पत्तों को सरसराती,
और  ढेरों मोटे झींगुर
गुनगुनाने लगते।
कुछ महीने पहले ही
मैकाले की लंबी पहाड़ियों को लांघ कर
वो युवा बाघिन
यहाँ आ कर रुकी।
रेतीली चट्टान पर झट से कूदी—
की मोर झन्ना गए,
भूरे  सांभर खुरो से खोदने लगे माटी
और जंगल में
एक अजब-सा ओपेरा गूँजने लगा।
सभी शामिल थे—
लंगूर भी।
लंबी पूँछ वाली भृंगराज
तान भरने लगी,
जादुई, आदिम स्वर-लहरियाँ।
बाघिन ने असंतोष जताया,
चट्टान पर काबिज़ हो गई।
हल्की गुरगुराहट,
और उसकी लहराती पूँछ से
किनारे उगी सफ़ेद कास 
हिलने लगी।
तीन चिंतकबरे शावक—
नौसिखिए कहीं के—
हिलती पूँछ से खेलते रहे।
सब कुछ ठहर गया,
पर पतंगों ने
भिनभिनाना नहीं छोड़ा।
 
खेंदरा बैगा भी भिनभिना रहा था
आख़िरकार पड़वा मिल ही गया 
नाखूनों से फाड़ कर खोखला,
फटी आंखे बुझ गई थी
छाती की पसलियाँ
बांस की खपच्ची-सी खुल गई थीं।
सूखे लहू पे लहराती
हरी मक्खियाँ 
दूसरी बारी था यह।
गुस्से में उसने ठोक दी टँगिया
कर्रा के तने में 
मुआवज़े का सरकारी चक्कर
उसने कन्हा सीखा।
यह तो जंगल की 
पीढ़ियों की लड़ाई थी।
मालिक तय होना था
रीति तय थी—
कीटों का जहर
मांस में मल दो,
रात गए
वो बचा मांस खाने
आएगी जरूर।
फिर आज सरई पानी में छुपकर
उसने बाघिन के शावक देख लिए
तो आँखों में
तालाब का पानी उतर आया।

ढलान पर
चित्तीदार चीतल हिल रहे थे।
बाघिन दुबककर रेंगती गई—
सूखे पत्तों को भी सहलाते हुए,
आहिस्ते-आहिस्ते।
चीतल सूँघ तो रहे थे,
पर मानो वो
खुद का सौदा जंगल से
कर चुके थे।

उधर खेंदरा बैगा भी
कास घास की ओर
खामोशी से रेंग रहा था 
एक और सौदा लेकर
शावक इस अबूझ खेल को
समझने की कोशिश में थे।
कुन्मुनाने लगे
थोड़ी देर पहले
बाघिन का दूध
घास पर बिखरकर
पनीर हो चुका था—
जो उसने
अपने शावकों को पिलाया था अभी अभी
परसा पत्ते के दोने में
बैगा उसे सहेज रहा था।
 बेटे की धुंधली आंखे 
बाघिन का दूध
ही इलाज होगा पक्का 
बैगा भांप गया 
उसने शावकों की आँखों से कहा
निश्चिंत रहो
सब भला है।
शायद शावक 
मूक भाषा समझ भी पाए।
सरई पानी
अब तालाब कहा रहा—
एक घर हो गया है,,,,, 

Tuesday, December 16, 2025

बाजरे की खिचड़ी : ज़ायके का लोकतंत्र

बाजरे की खिचड़ी : ज़ायके का लोकतंत्रहिंदुस्तानी खिचड़ी की कई नस्लें हैं और हर नस्ल की अपनी रिवायत, अपनी पंचायत और अपना मिज़ाज है। कहीं वह सादी, पतली, भात-सी बीमरहिन बनकर कमज़ोर जिस्म को सहारा देती है, तो कहीं पंच पकवानों में पकी बीरबल की शाही खिचड़ी बन जाती है, जहाँ ज़ायका तख़्त पर बैठा नज़र आता है। खिचड़ी का कमाल यही है कि जैसी ज़बान की फ़रमाइश हो, वैसा ही उसका असर भी हो जाता है। जाड़े की रात में गरम-गरम खिचड़ी से हुई मुलाक़ात दिल को भी गरमा देती है।इन तमाम सूरतों के बीच बाजरे की खिचड़ी अपनी अलग पहचान रखती है। यह नाज़ुक नहीं, खालिस खुरदुरी होती है—ठेठ देहाती, बिना बनावट के। इसमें मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू बसती है और रसोई की सच्चाई झलकती है। ऊपर से जब देसी घी चुचवा कर डाल दिया जाए, तो यह खिचड़ी सिर्फ़ पेट नहीं, मन भी भर देती है।बाजरे की खिचड़ी की फ़ितरत बड़ी खुली है। इसमें तरह-तरह के साग बे-झिझक आ बैठते हैं—हरा बटरा, गोभी, टमाटर, खड़ी हरी मिर्च। कोई क़ायदा-क़ानून नहीं, कोई मना नहीं। एक चुटकी हींग और थोड़ी-सी अजवाइन इसके मिज़ाज को और वसीअ कर देती है। यह खाना कम, मेहफ़िल ज़्यादा मालूम होता है।इसके साथ आने वाले साथी भी कम अहम नहीं। पापड़, क़दीमी नींबू का अचार और रात के वक़्त भी ज़रा-सा दही यहाँ पूरी तरह जायज़ ठहरता है। आज के दौर में लाल मिर्च का लहसुनी ठेंचा भी इसकी संगत में शामिल हो गया है—सुर्ख़, तीखा और बेबाक।बाजरे की खिचड़ी जल्दबाज़ी पसंद नहीं करती। यह धीमी आँच पर पकती है, इत्मीनान से, जब तक मूंग दाल पूरी तरह गल न जाए और बाजरा अपनी खुरदुरी शख़्सियत के साथ घुल-मिल न जाए। फिर इसे थाली में पसर जाने दिया जाता है—कुछ कौर चम्मच से और कुछ उँगलियों में लपेट-लपेट कर। यह खाने का नहीं, एहसास का अमल है।यक़ीनन, बाजरे की खिचड़ी भारतीय संविधान की प्रस्तावना की मानिंद है—सबको साथ लेने वाली, समावेशी और बराबरी की बात कहने वाली। इस तहज़ीबी ज़ायके को सिर्फ़ चखना नहीं चाहिए, इसे महसूस करना चाहिए।

Monday, December 15, 2025

शेर सिंह

कहानी

बर-झाड़ के झुरमुटों से घिरा एक छोटा-सा इलाका जिसका नाम पड़ा बार
यहीं  था नौ गोंड परिवारों का गाँव था—नवापारा
दो जुड़वाँ गाँव, और उन्हें चारों ओर से घेरे—बारनवापारा का घना बीहड़ जंगल।
अब लोग जो बाहर से आते है और कहते,
“लुवाठ का जंगल है… शेर तो है हे नहीं ,,,
पर गाँव वाले हँस देते।
“कौन कहता है शेर नहीं है?”
देवपुर घाट में मिले नहीं थी बाघ के पंजों के छापे
फोकट में तो नहीं उभरते। कभी यह गाँव भी शेर की दहाड़ से काँपता था। देर रात गूंजती थी  घाटों की नमी भरी गहराइया,,, झकझोंर देने वाली ध्वनि , और अल सबेरे जंगल की पगडंडी  जो सूखे नाले के साथ  रेंगती थी उसकि सफेद चमकीली धूल पे बड़े पंजे लगते थे,,,नर बाघ के,,, चौक्कने सांभर की चीत्कार ,,,कई मील दूर काले मुंह का लंगूर दहीमन की डालियों में छटपटाने लगता,,,मयूर वन गीत गाता,,,राजा साहेब की सवारी निकली है,,,सावधान,, पिहूयूँयूं, पिहूूयूँय,,,,,,,, मृग झुंड की पनियारी आंखे फैल लेती ,,जब धीमी बहती वन समीर पूरे परिवेश को उस बघयारिन गंध से मम्हहा देती

 कभी बहुत साल गए एक अमावस की रात आई,जब शिकारी भी आया,,पेड़ों पर मचान कसे गए,,नीचे भैंसा-पड़वा बाँधा गया।

पड़वा रात भर नरियाता रहा—
“माँऽऽ… माँऽऽ…”
सूखे पत्तों की चरचराहट दूर तक फैल गई।
बिसरैन की तीखी गंध हवा में भर गई।
अँधियारे में दो आँखें चमकीं—
बग्घ!

“आन दे… और आन दे…”फुसफुसाहट 
 अचानक,,बीस हाथ दूर से डबल बैरल गूँजी।ऐसा लगा मानो साल और सागौन के पेड़ों को किसी ने झकझोर कर जगा दिया हो।पूरा जंगल हिल उठा। भोर होते-होते गाँव में खटिया सजी।रात भर के मारे गए बाघों की कतारें ,,पूरा गाँव इकट्ठा था,,,कोई गिन रहा था,कोई पहचान रहा था।

“ये परसापाली वाला है,”
किसी ने कहा,
“मोर… बछिया उठाया रहा था।”
“इसका पिला होगा कहीं…”

उसी खटिया के पास
शुकुल जी बैठे थे,
अपनी दू-नाली साफ करते हुए।
“वो आदमी जल्दी में भाग काहे रहा है?”रे

बुढ़वा ठाकुर बताया
“आज ही उसका बेटा हुआ है साहेब
नरवा काटे खातिर औजार लेने जा रहा है।”

शुकुल जी मुस्कुराते हुए बोले
“तो फिर बच्चे का नाम रखो—शेर सिंह।”

और उस बच्चे का नाम पड़ गया 

बरस बीतते गए।
अब जंगल में शेर दिखना ही बंद हो गया।
पर ये कहानी बची रही।

आज का शेर सिंग,,,साठ बरस का डोकरा है। शाम को भुर्री तापते बच्चों को घेर कर बैठता है,,,और वही कहानी सुनाता है। कहता है“जेन दिन मैं जनमा,ओ दिन ले शेर ही नहीं दिखा कोई को,,,,शेर होगा फेर…पर अब दिखेगा काहे?”। हँसता है। “डरता होगा कहीं कि कोई फिर किसी लइका का नाम शेर सिंग झन धर दे…”आखिर  बारह शेर मारे गए ,, उस रोज,,जंगल यूं चुप रहता है पर उसकी चुप्पी में वही पुरानी दहाड़ अब भी कहीं गूँजती रहती है।

Sunday, November 23, 2025

बरहा औ जेपरा

घों–घों : जेपरा और बरहा 

खड़े धान खेत के मेड़           बीहीनियाँ के बेरा

जेपरा झाड़ी के पांतर काम करत रिहिस —
अचानक धकर–लकर झाड़ ऊपर चाघे 
औ झाड़ कौन? बमरी
जंगली सूरा घों घों करत कूदाइस,,

जेपरा कांटा–कुंटी ले खोर्राये
लुंगी एके झटका में बोचक गे 
नीचे रहिगे हरियर चड्डा अउ लटकत नाड़ा।

कैसे उतरतीस—
बरहा नीचे छेक के धऊक–धऊक करत बइठे रिहिस,
घों–घों, घों–घों…

जेपरा के हाथ–गोड़ खोर्रा गे,
लहू बोहात रिहिस —
ऊपर आसमान साफ, बीच में लटके हाथ गोड लाल ,,नीचे हरियात खेत में करिया बरहा घों घों,,

सारा बेटा बीच खेत में चार पांच पीला दे  रहे —
“अब कर ले लुवाठ, खेती–किसानी!”
पीरा में मरो, कानून में भी।

दू दिन बाद
जेपरा आवेदन धरे किंजरत रिहिस —
ये दफ्तर ले ऊ दफ्तर,
ये कुर्सी ले ऊ कुर्सी।

तहसीलदार —
“जंगली जीव है तो बनविभाग जाव।”

ऐति रेंजर साहब —
“आधा मुआवजा त तब मिलथे जब हाथ–गोड़ टूट जाव।
खोरचाये–हपटाये के तो कऊनो हिसाब नई।”

बोले — “गार्ड भेज के खेदवा देबो।”

दू हप्ता बीत गे।
ना गार्ड, ना खबर।
बरहा फेर रोजे दौड़ाथ हे —ये ददा,,का करबे
धान में, मेड़ में, सपनाए में। सारा बेटा

 दुख भरे दिमाग में
सरपंच के समाधान ,,नया आइडिया 
“सुतली बम में गहूं  आटा लपेट के रात में खेत भीतर फेक दे…
बस – सूरा खतम।

फेर एक बिहिनिया
खार में सूरा छर्री–दर्री परे मिलिस —
जबड़ा फाट गए रहे
अब काय करबो? सरपंच
जवाब सब्बो के मन के —
“भून के खा लेओ… पंचायत भर, फेर सोखा देओ।”
बिककट मिठाय रिहिस,भुने बरहा के मांस ,,ढोल ढोल तरी,,मिर्चा के फोरन ,,तेल  नई लागय,,,चर्बी में डबक जाहि,, पोटा कलेजी सब सपाट
जेन नई चखिस — कल्लाबे करही,,शिकायत

हफ्ता भर बाद
सब अधिकारी एके दिन धावा मारिन —
सोखड़ी मास पर्रा भर के के,जेपरा के छान्ही  में ,,बयान, मौका जांच, पंचनामा।
चार्ज बन पशु मारा है। ख़ाने खातिर।

रेंजर साहेब धार्मिक टाइप —
“तूमन बराहा अवतार मार दिए रे…हरामखोरो
गम्भीर धारा लगेगा!”

गाँव भर हँसा —
फेर रेंजर गंभीर।

जेपरा उखरू बैठ के सोचत रिहिस —
“मोला होदरत रिहिस त ओखर ऊपर कोनो धारा नई।
मय खाये तो मुआमला,, जम्मो  गांव चखा हरे साहब
हे… भगवान।”

एकतरफा कानून के पाटा में जेपरा दो तरफा पिसात।

सरपंच फारेस्ट गार्ड ले फुसफुसात हरे —
“समाधान निकलही साहब, सब्बो का भला हो।”

और फेर का हवा  पानी बदल गए
गरुवा डॉक्टर पोस्टमार्टम कर दीस —
“देवार डेरा का देशी सूरा था
जंगली पशु अधिनियम में नइ आवे।”

बस —
केस साफ।
जेपरा की बांच गे,,सरपंच के बुद्धि
औ मुआवजा?
एक गाड़ा धान का  बेचके
ऊपर से नीचे तक पूरा चुक्ता।बाबू आबू सब सेट,,रेंजर साहब बोलिस पूजा पाठ करवा लेबे,, बराह अवतार

धान खेत में आज भी रात–बिरात,,बरहा किंजरता है

“घों–घों… घों–घों…”

पर जेपरा अब नई भागथे।
बोलथे —
“कानून खुदे कहे हवय —
देशी सूरा है।
जंगली वाला नई।”

और खेत खार  हँसत  हरे।

Monday, August 14, 2023

प्रिय बच्चों ये आजादी का महोत्सव ,,सिर्फ गुलामी से आजादी का महोत्सव नही है ,,क्या 21 वर्ष के युवा भगत सिंग के ख्वाब न रहे होंगे,,एक अच्छे परिवार घर ,,एवम ऐश्वर्य शाली जीवन के,,पर उसने अपने सभी हितों को छोड़ कर फांसी का फंदा चूम लिया,,महात्मा गांधी ,,पंडित नेहरू जैसे हमारे नेताओं ने  जीवन के श्रेष्ठ वर्ष कारावास में बिताए,,क्यू,,, क्योंकि इन्होंहे ख्वाब देखा था,,,एक बेहतर समाज एक बेहतर राष्ट्र का ,,जंहा सभी संकीर्णताओं से मुक्त होकर हर एक शख्स ,,खिल सके ,,आगे बढ़ सके ,,अच्छा जीवन जी सके,,तो प्यारे बच्चों  15 अगस्त  के दिन हमने केवल गुलामी से आजादी नही पाई बल्कि हमने हजारों वर्षों की उन खराब परपम्पराओं से भी आजादी पाई ,,जाति ,,धर्म ,,,नस्ल के भेदभाव से भी आजाद होकर हम एक ऐसे राष्ट्र और समाज के निर्माण की ओर बढ़े जिसमे सब के लिए आगे बढ़ने के अवसर हों,, मैं चाहूंगा कि जब अपने पूर्वजों के बदौलत ये स्वतंत्रता हमने पाई है,,तो इसका सम्मान करें,,अपने व्यक्तित्व को आगे बढाते हुए ,,न केवल खुद का विकास करें,, बल्कि अपने साथ के हर व्यक्ति,,समाज और राष्ट्र के विकास के लिए प्रयास करें,,इन्ही कामनाओ के साथ,,जय हिंद

Tuesday, May 16, 2023

जंगल

इन दिनों जंगल,,,वाकई अनमने से है,,जरा बारिश क्या हुई घांस तो हरिया गई ,,पर फिर झुलसेगी ,,,बचे जिंदा  जल सोते अब गंदले पड़े है,, जिनमें सुबह शाम कतारें लगती है,,चौकस हरिणों ,,गौरों ,,औऱ तीखी पुकार लगाते मयूर जोड़ों की,,, संग छोटे छौने भी अपनी मां के संग डगमगाते ट्रेनिग ले रहे हैं मानसून के पहले दूध छोड़ तृण चरने वास्ते,,सफेद पूंछ दूधराज के कटोरीनुमा घोंसले बांस की फुनगियों में झूल रहे है साथ है पंख छितराई फिनटेल जो रह रह कर थिरकती है साथी के लिए,,,झिंगुरे भी झुंडों में मदमस्त संगीत छेड़ रहें है,,,झुन्त्रन्नंन्नंन्नं,, लाल सिर कलारी कोकडे ने सबसे ऊंची केनोपी में बड़े बिखरे अंदाज में आशियाना बनाना जारी रखा,,,तेंदू ,,चार झर लिए तो वानर दल कुछ बची हरी पत्तियों में जुटे पड़े है