सूरज के आते भोर हुआ, लाठी लेझिम का शोर हुआ।
यह नागपंचमी झम्मक-झम, यह ढोल-ढमाका ढम्मक-ढम।
हिंदी पाठ्य पुस्तकों की प्राथमिक कक्षा में सुधीर त्यागी जी की यह कविता सस्वर गाई जाती थी,,,सावन की पंचमी के दिन विद्यार्थी ,,खाखी हाफ पेंट और सफेद शर्ट पहने,,अपनी स्लेट पट्टी पर नाग नागिन जोड़े उकेरते बड़े मनोयोग से,,, ताजा खीरा और अगरबत्ती साथ ही चुटकी भर अबीर, की पुड़िया,,,और झुंड बना कर कूच करते ,,,स्कूल की ,ओर,,,मैदान के बीचों बीच ध्वजा रोहण की गोल वेदी पर टिके काले तख्ते को जिसे इस रोज खास तौर पर ,,काले कोयले से पोता जाता रहा,,,और कोई कुशल कलाकार शिक्षक,,,उसमें बड़े नाग नागिन का सफेद और अन्य रंगीन चाक से आकृति मनोयोग से बनाते,,,
36garh
Monday, August 17, 2026
Sunday, August 16, 2026
सोशल स्टेट
इसे चोरी कहो या नक़ल-चोरी,
हमने तो बस राहें मोड़ी।
सीखा तो इसलिए भी नहीं कि हमने कभी पूछा था,
प्रकृति का पन्ना-पन्ना ही पाठ सिखाने को खुला था।
अरसे से जंगली भैंसों ने,
मोटी घास को चर-चर कर छाँटा था,
ताकि बारिश की पहली बूँद से पहले,
कोमल नन्हीं दूब को उगाने का रास्ता बाँटा था।
चींटियों की वो मौन समझदारी,
सफेद इल्लियों को पत्तों पर चराती थी,
बदले में मिले मिठास के रस से,
अपनी छोटी-सी दुनिया चलाती थी।
दर्जिन चिड़िया पत्तों को सिलती थी,
बुनकर चिड़िया नीड़ बुनती थी,
इंसान ने देखा, समझा और सीखा,
उनकी कारीगरी से अपनी कला चुनी थी।
प्रकृति के इस खुले द्वार से,
मानव ने हुनर का हर पाठ पढ़ा,
पर जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता गया,
अहंकार का दायरा और बड़ा।
फिर हुनर के संग-संग उसने,
मक्कारी की नई चाल भी सीख ली,
बाँटने की जो रीत थी जग की,
उसे अपनी मुट्ठी में भींच ली।
आज वो सब जानता है जो वे जानते हैं,
पर विडंबना का दायरा देखिए—
जो कुछ भी उसने सीखा है इस जहाँ से,
अब अपने सिवा किसी और को नहीं बताता!
Wednesday, January 7, 2026
सरई पानी
सरई पानी
Tuesday, December 16, 2025
बाजरे की खिचड़ी : ज़ायके का लोकतंत्र
Monday, December 15, 2025
शेर सिंह
कहानी
बर-झाड़ के झुरमुटों से घिरा एक छोटा-सा इलाका जिसका नाम पड़ा बार।
यहीं था नौ गोंड परिवारों का गाँव था—नवापारा।
दो जुड़वाँ गाँव, और उन्हें चारों ओर से घेरे—बारनवापारा का घना बीहड़ जंगल।
अब लोग जो बाहर से आते है और कहते,
“लुवाठ का जंगल है… शेर तो है हे नहीं ,,,
पर गाँव वाले हँस देते।
“कौन कहता है शेर नहीं है?”
देवपुर घाट में मिले नहीं थी बाघ के पंजों के छापे
फोकट में तो नहीं उभरते। कभी यह गाँव भी शेर की दहाड़ से काँपता था। देर रात गूंजती थी घाटों की नमी भरी गहराइया,,, झकझोंर देने वाली ध्वनि , और अल सबेरे जंगल की पगडंडी जो सूखे नाले के साथ रेंगती थी उसकि सफेद चमकीली धूल पे बड़े पंजे लगते थे,,,नर बाघ के,,, चौक्कने सांभर की चीत्कार ,,,कई मील दूर काले मुंह का लंगूर दहीमन की डालियों में छटपटाने लगता,,,मयूर वन गीत गाता,,,राजा साहेब की सवारी निकली है,,,सावधान,, पिहूयूँयूं, पिहूूयूँय,,,,,,,, मृग झुंड की पनियारी आंखे फैल लेती ,,जब धीमी बहती वन समीर पूरे परिवेश को उस बघयारिन गंध से मम्हहा देती
कभी बहुत साल गए एक अमावस की रात आई,जब शिकारी भी आया,,पेड़ों पर मचान कसे गए,,नीचे भैंसा-पड़वा बाँधा गया।
पड़वा रात भर नरियाता रहा—
“माँऽऽ… माँऽऽ…”
सूखे पत्तों की चरचराहट दूर तक फैल गई।
बिसरैन की तीखी गंध हवा में भर गई।
अँधियारे में दो आँखें चमकीं—
बग्घ!
“आन दे… और आन दे…”फुसफुसाहट
अचानक,,बीस हाथ दूर से डबल बैरल गूँजी।ऐसा लगा मानो साल और सागौन के पेड़ों को किसी ने झकझोर कर जगा दिया हो।पूरा जंगल हिल उठा। भोर होते-होते गाँव में खटिया सजी।रात भर के मारे गए बाघों की कतारें ,,पूरा गाँव इकट्ठा था,,,कोई गिन रहा था,कोई पहचान रहा था।
“ये परसापाली वाला है,”
किसी ने कहा,
“मोर… बछिया उठाया रहा था।”
“इसका पिला होगा कहीं…”
उसी खटिया के पास
शुकुल जी बैठे थे,
अपनी दू-नाली साफ करते हुए।
“वो आदमी जल्दी में भाग काहे रहा है?”रे
बुढ़वा ठाकुर बताया
“आज ही उसका बेटा हुआ है साहेब
नरवा काटे खातिर औजार लेने जा रहा है।”
शुकुल जी मुस्कुराते हुए बोले
“तो फिर बच्चे का नाम रखो—शेर सिंह।”
और उस बच्चे का नाम पड़ गया
बरस बीतते गए।
अब जंगल में शेर दिखना ही बंद हो गया।
पर ये कहानी बची रही।
आज का शेर सिंग,,,साठ बरस का डोकरा है। शाम को भुर्री तापते बच्चों को घेर कर बैठता है,,,और वही कहानी सुनाता है। कहता है“जेन दिन मैं जनमा,ओ दिन ले शेर ही नहीं दिखा कोई को,,,,शेर होगा फेर…पर अब दिखेगा काहे?”। हँसता है। “डरता होगा कहीं कि कोई फिर किसी लइका का नाम शेर सिंग झन धर दे…”आखिर बारह शेर मारे गए ,, उस रोज,,जंगल यूं चुप रहता है पर उसकी चुप्पी में वही पुरानी दहाड़ अब भी कहीं गूँजती रहती है।