Wednesday, September 9, 2026

पोरा

  • जाता-चुकी’ की कथा  के अनुसार, राजा की बेटी जब मायके से विदा होने लगी, तो उसने अपनी बचपन की सहेली (कुम्हार की बेटी) से माटी के बर्तन माँगे ताकि वह पराए घर जाकर भी अपने मायके के स्वाद और संस्कृति को न भूले। तभी से पोरा पर कुम्हार द्वारा छोटी बच्चियों के लिए 'जाता-चुकी' गढ़ने का विधान बना।

​छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति में ‘पोरा’ (पोला) केवल एक त्यौहार मात्र नहीं है, बल्कि यह इस अंचल की कृषि-व्यवस्था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुधन के प्रति कृतज्ञता और श्रम-संस्कृति का सबसे जीवंत दस्तावेज है। भाद्रपद (भादो) मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों में भी पूरी आस्था, उल्लास और पारम्परिक भव्यता के साथ 'पोला' (Pola Festival) के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व भारत के इस मध्य क्षेत्र की उस मूल आत्मा को अभिव्यक्त करता है, जो माटी से जुड़ी है और जिसके केंद्र में हल चलाने वाला किसान, खेतों की कीचड़ में डटे रहने वाले मवेशी और श्रम का सम्मान है।

​१. पोला/पोरा का शाब्दिक और सांस्कृतिक फलक

​छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र दोनों ही राज्यों में पोला मुख्य रूप से पुरुषों और पशुधन के श्रम के उत्सव के रूप में जाना जाता है। लोक-विश्वास के अनुसार, पोला अमावस्या की वह पवित्र रात्रि होती है जब खेतों में लहलहाती धान और अन्य फसलों की बालियों में दूध भरना शुरू होता है (अन्न माता गर्भ धारण करती हैं)। इस परिवर्तन के स्वागत और कृषि-चक्र की निरंतरता के लिए प्रकृति का आभार जताने का यह विशिष्ट अवसर है। छत्तीसगढ़ में इसके ठीक दो दिन बाद आने वाले 'तीजा' (हरतालिका तीज) के साथ मिलकर यह पर्व मायके आने वाली बेटियों, पारिवारिक स्नेह और स्त्री-शक्ति के समूचे विधान को पूरा करता है, जबकि महाराष्ट्र में यह खेती के मौसम के बीच मवेशियों को समर्पित सबसे बड़ा कृषि-पर्व होता है।

​२. कुम्हार की चाक और माटी के नंदी (नंदी बैल)

​पोरा/पोला की परिकल्पना बिना कुम्हार (प्रजापति) समाज के शून्य है। त्यौहार के हफ़्तों पहले से कुम्हार अपने चाक पर माटी के नंदी (पोरा-बैल) और छत्तीसगढ़ में छोटी बालिकाओं के लिए 'चुकी-जाता' (रसोई के खिलौने और चक्की) गढ़ने में जुट जाते हैं।

  • ​पोला/पोरा के दिन घरों में इन मिट्टी के बैलों की स्थापना कर हल्दी, सिंदूर, दूब और फूलों से उनका श्रृंगार किया जाता है।
  • ​महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ दोनों ही जगहों पर बच्चे इन मिट्टी या लकड़ी के पहिए वाले बैलों को धागे से बांधकर गलियों में दौड़ाते हैं, जो इस पर्व का सबसे प्रमुख बाल-आकर्षण होता है।

​३. गोवंश की महिमा: कोसली-देशी बैल और श्रम का सम्मान

​छत्तीसगढ़ और विदर्भ (महाराष्ट्र) की कृषि मुख्य रूप से यहाँ की स्थानीय और प्रामाणिक गोवंश प्रजातियों पर टिकी रही है।

  • जैबू (Bos indicus) परिवार से ताल्लुक रखने वाले ये देशी बैल अपने मजबूत कुबड़ और द्विभाजित (Split) खुरों के कारण खेतों में जुताई और गाड़ी खींचने के लिए प्रकृति द्वारा प्रदत्त वरदान साबित होते हैं।
  • ​पोला के दिन इन मवेशियों को खेतों के कठिन श्रम से पूरी तरह मुक्ति दी जाती है। उनके सींगों की मालिश कर, उन्हें रंग-बिरंगे झूलों, कौड़ियों और घुंघरुओं से सजाकर तथा विशेष कलेवा व पूरनपोळी/ठेठरी-खुरमी का भोग लगाकर ग्रामीण समाज यह संदेश देता है कि मवेशी केवल संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार के सहयात्री हैं।

​४. लोक-व्यंजनों और सांस्कृतिक अनुष्ठान

  • महाराष्ट्र का पारंपरिक पकवान: महाराष्ट्र में पोला के अवसर पर घरों में विशेष रूप से पुरनपोळी (Puran Poli), मोदक, करंजी और आरसा जैसे पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें बैल की पूजा के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
  • छत्तीसगढ़ का पारंपरिक कलेवा: छत्तीसगढ़ में इस दिन 'ठेठरी' (संस्कृत के 'कल्यवर्त' यानी प्रातःकालीन कलेवा से विकसित), खुरमी और चौतेला बनाए जाते हैं, जो तीजा के समय बेटियों के साथ ससुराल भेजी जाने वाली 'दहरी' (कलेवा) का भी मुख्य हिस्सा बनते हैं।
  • ​इसके साथ ही, छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक मंदिरों (जैसे भोरमदेव, राजीव लोचन) और महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों के पाटिल-पंचों की देखरेख में गोठान पर होने वाले सामूहिक गो-पूजन यह प्रमाणित करते हैं कि पोला/पोरा लोक-संस्कृति और सामुदायिक समरसता का सबसे बड़ा पर्व है।

​निष्कर्ष

​आधुनिकता और मशीनीकरण के इस दौर में जहाँ खेती के तौर-तरीके बदले हैं, वहीं पोला/पोरा आज भी छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के जन-मानस को उसकी जड़ों से जोड़े रखने का सबसे बड़ा सेतु है। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि माटी का सम्मान, पशुधन के प्रति करुणा और श्रम का उत्सव ही किसी भी समृद्ध समाज की सच्ची नींव होते हैं।

​छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति में ‘पोरा’ (पोला) केवल एक त्यौहार मात्र नहीं है, बल्कि यह इस अंचल की कृषि-व्यवस्था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुधन के प्रति कृतज्ञता और श्रम-संस्कृति का सबसे जीवंत दस्तावेज है। भाद्रपद (भादो) मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों में भी पूरी आस्था, उल्लास और पारम्परिक भव्यता के साथ 'पोला' (Pola Festival) के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व भारत के इस मध्य क्षेत्र की उस मूल आत्मा को अभिव्यक्त करता है, जो माटी से जुड़ी है और जिसके केंद्र में हल चलाने वाला किसान, खेतों की कीचड़ में डटे रहने वाले मवेशी और श्रम का सम्मान है।

​१. पोला/पोरा का शाब्दिक और सांस्कृतिक फलक

​छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र दोनों ही राज्यों में पोला मुख्य रूप से पुरुषों और पशुधन के श्रम के उत्सव के रूप में जाना जाता है। लोक-विश्वास के अनुसार, पोला अमावस्या की वह पवित्र रात्रि होती है जब खेतों में लहलहाती धान और अन्य फसलों की बालियों में दूध भरना शुरू होता है (अन्न माता गर्भ धारण करती हैं)। इस परिवर्तन के स्वागत और कृषि-चक्र की निरंतरता के लिए प्रकृति का आभार जताने का यह विशिष्ट अवसर है। छत्तीसगढ़ में इसके ठीक दो दिन बाद आने वाले 'तीजा' (हरतालिका तीज) के साथ मिलकर यह पर्व मायके आने वाली बेटियों, पारिवारिक स्नेह और स्त्री-शक्ति के समूचे विधान को पूरा करता है, जबकि महाराष्ट्र में यह खेती के मौसम के बीच मवेशियों को समर्पित सबसे बड़ा कृषि-पर्व होता है।

​२. कुम्हार की चाक और माटी के नंदी (नंदी बैल)

​पोरा/पोला की परिकल्पना बिना कुम्हार (प्रजापति) समाज के शून्य है। त्यौहार के हफ़्तों पहले से कुम्हार अपने चाक पर माटी के नंदी (पोरा-बैल) और छत्तीसगढ़ में छोटी बालिकाओं के लिए 'चुकी-जाता' (रसोई के खिलौने और चक्की) गढ़ने में जुट जाते हैं।

  • ​पोला/पोरा के दिन घरों में इन मिट्टी के बैलों की स्थापना कर हल्दी, सिंदूर, दूब और फूलों से उनका श्रृंगार किया जाता है।
  • ​महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ दोनों ही जगहों पर बच्चे इन मिट्टी या लकड़ी के पहिए वाले बैलों को धागे से बांधकर गलियों में दौड़ाते हैं, जो इस पर्व का सबसे प्रमुख बाल-आकर्षण होता है।

​३. गोवंश की महिमा: कोसली-देशी बैल और श्रम का सम्मान

​छत्तीसगढ़ और विदर्भ (महाराष्ट्र) की कृषि मुख्य रूप से यहाँ की स्थानीय और प्रामाणिक गोवंश प्रजातियों पर टिकी रही है।

  • जैबू (Bos indicus) परिवार से ताल्लुक रखने वाले ये देशी बैल अपने मजबूत कुबड़ और द्विभाजित (Split) खुरों के कारण खेतों में जुताई और गाड़ी खींचने के लिए प्रकृति द्वारा प्रदत्त वरदान साबित होते हैं।
  • ​पोला के दिन इन मवेशियों को खेतों के कठिन श्रम से पूरी तरह मुक्ति दी जाती है। उनके सींगों की मालिश कर, उन्हें रंग-बिरंगे झूलों, कौड़ियों और घुंघरुओं से सजाकर तथा विशेष कलेवा व पूरनपोळी/ठेठरी-खुरमी का भोग लगाकर ग्रामीण समाज यह संदेश देता है कि मवेशी केवल संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार के सहयात्री हैं।

​४. लोक-व्यंजनों और सांस्कृतिक अनुष्ठान

  • महाराष्ट्र का पारंपरिक पकवान: महाराष्ट्र में पोला के अवसर पर घरों में विशेष रूप से पुरनपोळी (Puran Poli), मोदक, करंजी और आरसा जैसे पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें बैल की पूजा के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
  • छत्तीसगढ़ का पारंपरिक कलेवा: छत्तीसगढ़ में इस दिन 'ठेठरी' (संस्कृत के 'कल्यवर्त' यानी प्रातःकालीन कलेवा से विकसित), खुरमी और चौतेला बनाए जाते हैं, जो तीजा के समय बेटियों के साथ ससुराल भेजी जाने वाली 'दहरी' (कलेवा) का भी मुख्य हिस्सा बनते हैं।
  • ​इसके साथ ही, छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक मंदिरों (जैसे भोरमदेव, राजीव लोचन) और महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों के पाटिल-पंचों की देखरेख में गोठान पर होने वाले सामूहिक गो-पूजन यह प्रमाणित करते हैं कि पोला/पोरा लोक-संस्कृति और सामुदायिक समरसता का सबसे बड़ा पर्व है।

​निष्कर्ष

​आधुनिकता और मशीनीकरण के इस दौर में जहाँ खेती के तौर-तरीके बदले हैं, वहीं पोला/पोरा आज भी छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के जन-मानस को उसकी जड़ों से जोड़े रखने का सबसे बड़ा सेतु है। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि माटी का सम्मान, पशुधन के प्रति करुणा और श्रम का उत्सव ही किसी भी समृद्ध समाज की सच्ची नींव होते हैं।

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