भारतीय भोजन की संस्कृति केवल उदर पूर्ति का माध्यम नहीं, बल्कि चटखारे के इतिहास, भूगोल, भाषा और विज्ञान का एक अनूठा दस्तावेज है।
इस पाक-यात्रा की शुरुआत करते है दक्षिण भारत से , जहाँ तमिल भाषा के 'करी' (Kari) शब्द का जन्म हुआ। प्राचीन संगम-युग के साहित्यों में 'करी' का अर्थ मांस या सब्जियों से तैयार किए जाने वाले उन गाढ़े और मसालेदार व्यंजनों से था, जिनमें मूल रूप से काली मिर्च के तीखेपन की प्रधानता होती थी। और जिससे जुड़ी है 'करी पत्ते' की वह सुगंधित पहचान, जो दक्षिण भारतीय व्यंजनों की आत्मा है। चूँकि तमिल में इसे 'करी वेप्पिलेइ' कहा जाता था, इसलिए अंग्रेजों ने इन व्यंजनों और इस सुगंधित पत्ते दोनों को ही 'करी' से जोड़ दिया। क्षेत्रीय तेलों और छौंक की बात करें तो दक्षिण में 'करी' पकती है पारंपरिक रूप से नारियल के तेल या तिल के तेल के साथ राई (Mustard Seeds) का तड़का लगाना अनिवार्य माना जाता है, जो इसके स्वाद को विशिष्ट तीखापन देता है। आगे चलकर औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने सुविधा के लिए 'करी पाउडर' का आविष्कार कर दिया, जो ब्रिटेन की 'चिकन टिक्का मसाला' जैसी ग्लोबल डिश तक जा पहुँचा।
जब भारतीय मसालों और 'करी' की यह अवधारणा समुद्री मार्गों और व्यापार के जरिए दुनिया भर में पहुँची, तो इसने कई विदेशी संस्कृतियों में ढलकर अपने नए रूप गढ़े। दक्षिण-पूर्व एशिया में थाई करी इसका एक बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ भारतीय मसालों की तर्ज पर स्थानीय जड़ी-बूटियों, गालंगल, लेमनग्रास और नारियल के दूध का उपयोग करके करी बनाई जाती है। इसी तरह, ब्रिटिश नाविकों और व्यापारियों के जरिए यह करी 19वीं शताब्दी में जापान पहुँची, जहाँ यह जापानी लोगों की पसंदीदा जापानी करी बन गई, जो अपने भारतीय मूल की तुलना में अधिक गाढ़ी और सॉस जैसी होती है। इसके अलावा, कैरिबियाई देशों में भी भारतीय प्रवासियों के साथ 'करी' पहुँची, जहाँ वहाँ के स्थानीय स्वादों के साथ मिलकर कैरिबियाई करी दुनिया भर में मशहूर हो गई।
इसके विपरीत, उत्तर भारत और विशेष तौर पर छत्तीसगढ़ की माटी में रची-बसी पारंपरिक 'कढ़ी' का इतिहास बिल्कुल अलग और स्वदेशी है। संस्कृत के 'क्वथिका' (यानी उबालकर तैयार किया गया गाढ़ा रस) से उपजी कढ़ी का मूल आधार खट्टा दही या छाछ और बेसन है। छत्तीसगढ़ी रसोई में इस कढ़ी परिवार की विविधता बहुत ही अनूठी है, जहाँ सादी दही-बेसन की कढ़ी के साथ-साथ 'भजिया कढ़ी' (बेसन या प्याज के पकौड़ों वाली कढ़ी), बेसन की छोटी-छोटी बूँदियों से बनने वाली 'बूंदिया कढ़ी', बड़ी ही खूबी से तैयार होने वाली 'डुबकी कढ़ी' (जिसमें मूंग या उड़द दाल की मंगौड़ियों को सीधे कढ़ी में डुबोकर पकाया जाता है), और उड़द या चने की दाल के पिसे पेस्ट से बनने वाले खास 'गारे' वाली कढ़ी का विशेष स्थान है। कढ़ी जब उत्तर भारतीय राज्यों में बनती है तो उसमें गाढ़ी दही पड़ती है । इस पूरी प्रक्रिया में जब हींग (Asafoetida), राई-जीरे और सूखी लाल मिर्च का छौंक लगता है (जो प्राचीन काल की केवल काली मिर्च वाले तड़के के बाद बाद के समय में भारतीय रसोई का एक अहम हिस्सा बनी), तो कढ़ी की महक दूर तक फैल जाती है। छत्तीसगढ़ और उत्तर भारत में पारंपरिक रूप से इसके तड़के के लिए सरसों के तेल या शुद्ध देशी घी का बहुतायत से प्रयोग होता है, जो इसकी सौंधी महक को और गहरा करता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि पारंपरिक कढ़ी की मूल संरचना पूरी तरह से प्राचीन और स्वदेशी है, जिसमें बाद के कालखंड में लाल मिर्च जैसी नई दुनिया की फसलें भी तड़के के रूप में शामिल हो गईं।
इसी कड़ी में जब हम उत्तर भारत की ग्रेवी या शोरबे के लिए प्रयुक्त होने वाले 'तरी' शब्द की ओर देखते हैं, तो इसका सिरा फारसी संस्कृति से जुड़ता है। फारसी के 'तर' (यानी गीला या नमीयुक्त) शब्द से उपजा यह रूप मुगलकाल के दौरान भारतीय रसोई में दाखिल हुआ। कोरमा, शोरबा और निहारी जैसे मुगलई व्यंजनों में ऊपर तैरने वाला रोगन और मसालेदार रस्सा ही 'तरी' कहलाया। इन समृद्ध व्यंजनों में तरी या रोगन को उभारने के लिए देशी घी या गाढ़े तेलों का उदारता से उपयोग किया जाता था, जो प्राचीन भारतीय 'यूस' (सूप) से अलग एक नई भोग-विलास की शैली लेकर आया था, जिसमें गरम मसालों, काली मिर्च और बाद में लाल मिर्च के तीखेपन तथा हींग जैसी पाचक सुगंधों का गहरा मेल होता था।
इन तमाम स्वादों और तेल-तड़कों को साधने का काम करती है मेथी, हींग और करी पत्ता जैसी औषधीय वनस्पतियाँ। जहाँ मेथी मूल रूप से भूमध्यसागरीय क्षेत्र से होते हुए आयुर्वेद के जरिए हमारी रसोई का हिस्सा बनी, वहीं हींग (जो मध्य एशिया से व्यापार के जरिए भारत आई) और राई ने मिलकर भारतीय व्यंजनों के पाचन तंत्र को मजबूत किया। शुरुआती दौर में तीखेपन के लिए केवल काली मिर्च का प्रयोग होता था, जो समय के साथ लाल मिर्च के तड़के के रूप में भी विकसित हो गया। करी पत्ता भारतीय उपमहाद्वीप की वह देन है जिसने दक्षिण की 'करी' और छत्तीसगढ़ी भजिया-गारे वाली कढ़ी के छौंक को अमर कर दिया। मेथी दाने की कड़वाहट, राई की चटचटाहट, लाल-काली मिर्च का तीखापन और हींग-करी पत्ते की खुशबू जहाँ व्यंजनों के स्वाद को संतुलित करती है, वहीं लोक-संस्कृति और कहावतों में कढ़ी की सादगी हमारी सामाजिक बानगी का हिस्सा बन जाती है।
संक्षेप में, करी, तरी और कढ़ी केवल स्वाद के अलग-अलग रूप नहीं हैं, बल्कि यह उस साझी सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं जहाँ दक्षिण के नारियल तेल व करी पत्तों, फारसी शोरबों के रोगन, उत्तर व छत्तीसगढ़ के सरसों के तेल, राई-हींग और लाल-काली मिर्च के चटक तड़के, छत्तीसगढ़ की पारंपरिक बूंदिया, भजिया, डुबकी और गारे वाली कढ़ी के रूपों, प्राचीन भारतीय छाछ-बेसन, जापानी-थाई विदेशी रूपों और ऐतिहासिक आदान-प्रदान ने मिलकर हमारी थाली को दुनिया की सबसे समृद्ध थाली बनाया है।
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