Sunday, August 30, 2026

मैकल का मानसून

विरही मेघ कालिदास के

 उमड़ते,, पर्वत के भाल पर 

प्रथम तिलकोत्सव रचते हैं,

तब विन्ध्य की अंजलि से छिटकी

मैकल की उपात्यकाएं और शिखर 

आदिम स्पंदन से जगते हैं।

​आषाढ़ पर ऐसे ताव से

टूटती है तड़ित क्रोध में

धरती की प्यासी छाती पर

बूंदों की झंकृत तान ,,

कीटों संग राग छेड़ती है

फिर ​हर जन्मदिवस भांति

—मेकल-पुत्री रेवा 

शिलाओं के कठोर वक्ष को चीरकर,

कल-कल छल-छल करती,

किल्लोल कर उतरती है,

​साल के सघन वनों में 

फिसलती काई भरी मोड़ों से

हरी पन्नों सज्जित वल्लरी झुंडों से

झुपते बैगाओं के मांदर की थाप पर

नवरंग और चातक की पुकार 

गूँज उठती हैं गहरी घाटियाँ,

कंद-मूल और करील की महक से

आदिम जीविषा मुस्कुराती है।

​रातों की विकट नीरवता में

जुगनू बुनते हैं  नक्षत्र-लोक,

ओट में दुबके लंगूर झांकते

मृग मयूर झुंडों को पुकारते 

देवी का व्याघ्र गरजता है

आखिर

कांस की बूढ़ी बालियाँ

हवा में चँवर डुलाने लगती हैं,

रेवा का मटमैला वेग

पारदर्शी हो चलता है।

​ विदा ऐ मानसून

किसी अंत की आहट नहीं,

यह तो मेकल-पुत्री के अमर प्रवाह में

सृष्टि के अटूट प्रेम का

पुनर्जन्म है।

Wednesday, August 26, 2026

कास (कांस) घास: परंपरा, का धवल सौंदर्य   

आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण में घांस के फूलने का वर्णन कुछ इस तरह किया है

काशपुष्पैः प्रतीच्छन्ना गौरांगीयं वसुंधरा।" (अर्थ: यह पृथ्वी कास के सफेद फूलों से ढककर गौर वर्ण (सफेद कांति) वाली सुंदरी जैसी शोभा पा रही है।)भारतीय उपमहाद्वीप में कास का फूलना मानसून की समाप्ति और शरद ऋतु के आगमन का सूचक माना गया है तुलसी दास जी भी किष्किन्धा कांड में कहते है। फूले कास सकल महि छाई। जनु बरसा कृत प्रगट बुढ़ाई ''

​ 'कांस' या 'कास' (वैज्ञानिक नाम: Saccharum spontaneum) ऐसी   दिव्य और जुझारू घास है जिसने भारतीय संस्कृति में गहरा प्रभाव छोड़ा है



​कांस घास वनस्पति विज्ञान के घास कुल (Poaceae family) का सदस्य है और इसे गन्ने (Saccharum officinarum) का जंगली रिश्तेदार माना जाता है। इसमें परागण मुख्य रूप से हवा द्वारा (Wind Pollination / Anemophily) होता है। इसके फूले हुए मंजरों से हल्के परागकण हवा में तैरते हैं और इसका पंखदार वर्तिकाग्र उन्हें आसानी से ग्रहण कर लेता है। इसके बीज बहुत छोटे और रुई जैसे सफेद रेशों से ढके होते हैं, जो पकने पर हवा में छोटे-छोटे पैराशूट की तरह उड़कर मीलों दूर तक फैल जाते हैं। बीजों के अलावा, यह जमीन के नीचे छिपे अपने मजबूत प्रकंदों (Rhizomes) के जरिए भी तेजी से कायिक प्रवर्धन करती है।

​यह घास केवल भारत तक सीमित न होकर नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यानमार, चीन, मिस्र, सूडान और भूमध्यसागरीय यूरोप तक फैली हुई है। भारत की विभिन्न बोलियों और भाषाओं में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। गोंडी में इसे कास या कसार, संथाली में कास बाहा, कुड़ुख व मुंडारी में कासी, और भीली में कांसड़ो कहा जाता है। दक्षिण भारत की द्रविड़ भाषाओं में इसे मुख्य रूप से गन्ने से जोड़कर देखा जाता है—तेलुगु में रेल्लु गड्डि या काकि चेरुकु (जंगली गन्ना), तमिल में पेक्करिम्बू, कन्नड़ में काडु कब्बू और मलयालम में नन्नना कहा जाता है।

​सनातन और जनजातीय परंपराओं में कांस का स्थान अत्यंत पवित्र है। इसे सूर्य देव की दीप्ति और प्रकाश का प्रतीक माना गया है, वहीं जल तटों पर उगने के कारण इसके मूल में वरुण देव और शेषनाग (बलराम स्वरूप) का वास माना जाता है। हल षष्ठी (खमरछठ) के व्रत में संतान की सुरक्षा के लिए महिलाएँ कांस की झाड़ी (छितरी) गाड़कर पूजा करती हैं। सनातनी विवाह संस्कारों में मंडप (मड़वा) को छाने, वेदी पर बिछाने और हल्दी की रस्म में शीतलता व बुरी नज़र से बचाव के लिए कास का प्रयोग अनिवार्य है, वहीं संकल्प के समय कास या कुश की बनी 'पवित्री' पहनी जाती है।

​मध्य भारत की बैगा, गोंड, संताल और कोरकू जनजातियों की लोककथाओं में कांस को 'सृष्टि की पहली घास' माना गया है, जिसे बड़ा देव ने पृथ्वी को स्थिरता देने के लिए उगाया था। छत्तीसगढ़ी और जनजातीय ददरिया गीतों में कास के खिलने को प्रेम, विरह और पर्वों के संकेत के रूप में गाया जाता है— "नदी के तीर-तीर फूले हे कास रे, तोर मया म गोरी, छूट गे प्यास रे..."

​धान और कांस का पारिस्थितिक और सांस्कृतिक रिश्ता भी बहुत अटूट है। दोनों एक ही 'पोएसी' परिवार के सदस्य हैं। किसानों के लिए कांस के सफेद फूलों का खिलना इस बात का प्राकृतिक संकेतक है कि मानसून विदा ले रहा है और धान की फसल में दूध भर रहा है। छत्तीसगढ़ी में यह कहावत बहुत प्रसिद्ध है— "जब नदिया पार म कास फूले, तब खेत म धान झूले।"

​प्राचीन कला और साहित्य में भी कास का व्यापक अंकन मिलता है। महाकवि कालिदास ने 'ऋतुसंहारम्' में शरद ऋतु का वर्णन करते हुए लिखा है कि शरद रूपी नवोढ़ा दुल्हन ने काश के सफेद फूलों की साड़ी पहन रखी है ("काशपुष्पांसुका देवि...")। सांची व भरहुत के स्तूपों, अजंता के गुफा चित्रों और महाबलीपुरम के 'गंगावतरण' शिल्प में आश्रम जीवन और तराई के दृश्यों को दर्शाने के लिए कास की झाड़ियों का अंकन मिलता है। मेगास्थनीज (इंडिका) और ह्वेनसांग (सी-यू-की) जैसे विदेशी यात्रियों ने गंगा व तराई के घने सरकंडों व विशाल घास के मैदानों का वर्णन किया, जबकि आधुनिक वैज्ञानिक कार्ल लिनिअस ने इसका नाम Saccharum spontaneum रखा और विलियम रोक्सबर्ग ने इसके औषधीय व भौतिक गुणों का दस्तावेजीकरण किया।

​पर्यावरण और आयुर्वेद की दृष्टि से कास अत्यंत उपयोगी है। काजीरंगा और तराई क्षेत्रों में एक-सींग वाले गेंडे, जंगली भैंसे, हाथी, बारहसिंगा और दुर्लभ हिसपिड खरगोश इसे चाव से खाते हैं। इसकी गहरी जड़ें नदियों के कटाव (Soil Erosion) को रोकती हैं। आयुर्वेद में यह 'तृणपंचमूल' का एक मुख्य घटक है, जो मूत्र विकार, पथरी और शरीर की आंतरिक जलन को शांत करने में औषधि का काम करती है।

​कांस घास प्रकृति का एक ऐसा अनमोल उपहार है जो बंजर जमीन पर भी सहर्ष उग आता है। यह हमें सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी कैसे जुझारूपन से खिलखिलाकर जिया जाता है। नदियों के किनारों पर झूमते इसके सफेद मंजर न केवल शरद के आगमन का संदेश देते हैं, बल्कि भारत की प्राचीन चेतना, साहित्य और लोक-जीवन को आज भी जीवंत बनाए हुए हैं।

Tuesday, August 25, 2026

बदल गया है

हसरतों के हरियाने वास्ते
ये डेहरी,,, लांघनी  होगी
फैली है दुनिया की चौहद्दी 
बाड़ पार ,, मापनी होगी
ये जद्दोजहद मै करूंगी
अकेले ,,, खुद के साथ 
खोजने खुद को,,
कहते है जमाना बदल गया है
उस बदलाव की असलियत
अब जाननी होगी




Monday, August 17, 2026

सूरज के आते भोर हुआ, लाठी लेझिम का शोर हुआ।

यह नागपंचमी झम्मक-झम, यह ढोल-ढमाका ढम्मक-ढम। 

हिंदी पाठ्य पुस्तकों की प्राथमिक कक्षा में सुधीर त्यागी जी की यह कविता सस्वर गाई जाती थी,,,सावन की पंचमी के दिन विद्यार्थी ,,खाखी हाफ पेंट और सफेद शर्ट पहने,,अपनी स्लेट पट्टी पर नाग नागिन जोड़े उकेरते बड़े मनोयोग से,,, ताजा खीरा और अगरबत्ती साथ ही चुटकी भर अबीर, की पुड़िया,,,और झुंड बना कर कूच करते ,,,स्कूल की ,ओर,,,मैदान के बीचों बीच ध्वजा रोहण की गोल वेदी पर टिके काले तख्ते को जिसे इस रोज खास तौर पर ,,काले कोयले से पोता जाता रहा,,,और कोई कुशल कलाकार शिक्षक,,,उसमें बड़े नाग नागिन का सफेद और अन्य रंगीन चाक से आकृति मनोयोग से बनाते,,,

Sunday, August 16, 2026

सोशल स्टेट

इसे चोरी कहो या नक़ल-चोरी,

हमने तो बस राहें मोड़ी।

सीखा तो इसलिए भी नहीं कि हमने कभी पूछा था,

प्रकृति का पन्ना-पन्ना ही पाठ सिखाने को खुला था।

​अरसे से जंगली भैंसों ने,

मोटी घास को चर-चर कर छाँटा था,

ताकि बारिश की पहली बूँद से पहले,

कोमल नन्हीं दूब को उगाने का रास्ता बाँटा था।

​चींटियों की वो मौन समझदारी,

सफेद इल्लियों को पत्तों पर चराती थी,

बदले में मिले मिठास के रस से,

अपनी छोटी-सी दुनिया चलाती थी।

​दर्जिन चिड़िया पत्तों को सिलती थी,

बुनकर चिड़िया नीड़ बुनती थी,

इंसान ने देखा, समझा और सीखा,

उनकी कारीगरी से अपनी कला चुनी थी।

​प्रकृति के इस खुले द्वार से,

मानव ने हुनर का हर पाठ पढ़ा,

पर जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता गया,

अहंकार का दायरा और बड़ा।

​फिर हुनर के संग-संग उसने,

मक्कारी की नई चाल भी सीख ली,

बाँटने की जो रीत थी जग की,

उसे अपनी मुट्ठी में भींच ली।

​आज वो सब जानता है जो वे जानते हैं,

पर विडंबना का दायरा देखिए—

जो कुछ भी उसने सीखा है इस जहाँ से,

अब अपने सिवा किसी और को नहीं बताता!