Sunday, July 20, 2014

बजरहिन गाय...

बजरहिन गाय...

वो निचट भूरी बजरहिन गाय थी .... सब्जी मण्डी में किनजरते हुए ही  उदन्त बछिया से आठ दंत गाय हुई थी...कभी लाल भाजी की जूरी पे मुह मार दिया तो कभी कुढोये फूल गोभी पे ... सब्जी वाली की नजर चुकी नही की ... सर्पीली जीभ लपक पड़ी  ...  मुह में सब्जी ठुंसे ... लेकिन बाजार का हिसाब  वो अच्छे से समझती थीं सो झट अपनी पीठ आघे कर देती ..ले तन्हु अपन हिस्सा ले ले.. सब्जी के भाव के हिसाब से सब्जी वाली की सोंटी पडती ..सट... रोगही बजरहिन नि तो...ऐसे ही लौठी पुरे दिन  गूंजती  ..और वो एक ठेले से दुसरे युही भीड़ से अपनी पीठ घिसते मौके लपकती..फिर रात गये किसी सेड के निचे ..भिनभिनाती मख्यियो और बस्साते गोबर से लिपटी पूंछ को हिलाते ..जुगाली होती.. दिन भर की मेहनत  का सुवाद और साथ ही कुछ पुरानी धुंधली अपने पन भरी मीठी यादें
                            ..एक अंधियार भरा  कोठा ...एक फैला हुआ मैदान...ठेठवार की पगड़ी और हा अपनी माँ के थन..कभी लगता उस अपनेपन की ओर दौड़ के चले जाऊ..और अब तो वो  खुद गाभिन थी . ...
             ऐसे ही एक सुबह अचानक   वही ठेठवार की पगड़ी  फिर दिखी ... और उसे एक गाड़ी में खीच कर चढ़ाया गया.. फिर क्या वो बाजार पीछे छुटता गया....सामने था खपरे वाला वही अंधियार भरा कोठा ...अपने जैसे काली भूरी कई गायों के बीच वो असमंजस से एक कोने में बैठ गयी ...उसे ये सुगंध मतवाली कर रही थी...उन गायों के बीच वो उनके थन को घुर रही थी..लेकिन पहचान नही पाई...सुबह ठेठवार के साथ पूरी बरदी टनटनाते हुए आघे बढ़ रही थी ...भूरी लाल धूल ...उसे याद आ गया वो हरा मैदान भी ..गाड़ी की आवाज सुन कर भी उसने सड़क नही छोड़ी ..और ठेठवार ने धीमी से सोंटी उसके पीठ पे धर दी ...च्ल्ल्ल्ल...
               सोंटी की धीमी मार ने उसे जगा सा दिया अपनी यादों से जिनमे अब वो मीठा पन नही था ..वो बैचैन हो गयी...अब खली भूंसा सब बेस्वाद...वो खोमचे ठेले सब घूम रहे थे उसके सामने....ठेठवार गुस्सा रहा है ..आठ दिन ले लांघन हस ..कैसे जनमबे...मुह लप्कई के आदत हे ...परोसे कन्हा मिठाही ....अगले दिन वो फिर उसी गाड़ी में धकेल दी गयी ...जब कोठा पीछे छूट रहा था तो उसे लगा गायों की आंखे घुर रही हो ...जैसे कुछ पहचान गयी हों .. पर अपके उसने मुह.झटक लिया मानो कुछ भूलना चाहती हो...गाड़ी उसी  बाजार में जा रुकी ..ठेठवार सामने बैठी सब्जी वाली से कह रहा था . मर जातिस  काकी लाँघन पारे रिहिस..ले अब जा किंजर...
वो सीधे उसी सब्जी वाली के सामने जा पहुची...सब्जी वाली हैरान थी ...फेर आगेस ओ....उसने हलके से सर हिलाया..और झट से जीभ गोभी की ओर लपक गयी ...हट रे बज रहीन नि तो..सब्जी वाली सोंटी टटोल रही थी!!!!उसने अपनी पीठ ख़ुशी से आघे कर दी

अनुभव
          

Saturday, June 21, 2014

झीरम में खेलते बच्चे

झीरम में खेलते बच्चे
लाल आँखों वाला सफ़ेद बाज हवा में तैर रहा था...निचे घांस में घूरता एकटक ...इनही झाड़ियो में घसीटते हुए वो भी नीचे घाटी की ओर सरकता गया .. बांस के झुरमुट में..उसे अपनी चितकबरी वर्दी की बांयी ओर एक जख्म महसूस हुआ..हाफते हुए वो टिक गया एक दीमक की बाम्बी की आड़ से..और ध्यान से उन आवाजो को सुनने लगा ..जो उपर की सड़क से आ रही थी..हवा में बसीयाती बारूद की गंध और गोलियों की आवाज ...गोड़ी भासा के नारे...और हंसी
                    उसने घाव से रिसते खून पे हथेली धर दी लगा शायद अब खून बहना कुछ रुक गया हो .पर दर्द का अहसास अब तक नही था ..था तो केवल वो भयानक भय ..जो झींगुरो की तरह चारो और से उसे घेरे था ..झुन्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न..मौत ऐसी ही खामोसी से धीरे धीरे उसकी सांसो में गूंज रही थी ..उसने अपनी आंखे मुंद ली....घर का आंगन .. अपनी माँ के साथ खेलते बच्चे ... ...बच्चे जो जिद्द कर रहे हो पापा आज मेला जायेंगे...बच्चो के गुलाबी गाल ..जिसे उसने युही हाथ बढ़ा कर छूने की कोशिश की .और...खून फिर बहने लगा था ..बिलकुल लाल ..काला गरम् ...उसने अपनी आँखों को फिर बंद कर लिया ...  बच्चे  अब भी खेल रहे थे ...मेला जाने को तैयार ..कलफ वाली नीली साड़ी में महकती बीवी ...और फिर वो खुद बचपन में पहुच गया ...अपनी माँ की गोद में ...माँ की मसालों से भीगी उंगलियों की खुसबू ..... बारूद की गंध ने उसे फिर जगा दिया...
               उपर सड़क से आवाजे निचे उतर रही थी...उसकी सांसे बढने लगी ...उसने कभी मौत को लेकर अब तक सोंचा ही नही था ..खुबसूरत जिन्दगी से दूर ले जाते इस न होने के अहसास के बारे में..जिन सांसो पे कभी ध्यान ही नही दिया वो सिमट रही थी .. अजीब सी सिहरन ..
          लगा इन उतरती आवाजो के पहुचने के पहले ही अपनी बंदूक से ये डर   खत्म कर दू ..आखिर अब तो उसे ढूंढ़ ही लिया जायेगा ..पर फिर  इस विचार को झिडक दिया.कुछ घड़ी ही सही ..अपने उस आंगन को और उस जिन्दगी को ... एक बार फिर देख तो लू ... संगी साथीयो के साथ..उन गलियो में दौड़ते हुए...सामूहिक हंसी  ...सब कुछ कितना मोहक  ..और अब ये भय इन सब से दूर होने का ..अकेले होने का ..फिर उसे लगा जैसे उपर से उतरते ये लोग जल्द ही उस तक आ जाये ..वो इस अकेले पन में जाने से पहले किसी का साथ चाहता था ..अपने दुश्मन का ही सही....आवाज अब बहुत करीब आ गयी थी ..उसने अपनी डबडबायी आंखे खोल ली..... ठीक सामने उसकी जैसी ही वर्दी में कुछ लोग खड़े थे ....तनी हुई बंदूक के सामने ...अब की बार उसने आंखे नही मुंदी ...अपनी आती हुई मौत को देखने के लिए वो अब अकेला नही था...तभी लाल  आँखों वाले बाज ने नीचे अचानक गोता लगाया उड़ गया...चोंच में कुछ सपने दबाय...

अनुभव

Wednesday, May 28, 2014

ममा बचा ले गा

ममाँ औ भांचा
राजिम में मामा औ भांचा के मंदिर ...ठाकुर पुजेरी कहानी कहता है .नदिया ये पार का जो मन्दिर नई है वो ममा है .औ कुलेश्वर महादेव भांचा.. जन्हा पूरा आया तो पैरी महानंदी का पानी मन्दिर उपर  चघना शुरू ..बीच में भांचा बुड़ाने लगता है फेर भांचा चिल्लाही ..बुडत हो ममा ..बचा ले गा ...ममा भांचा का गोहार सुन के सब पानी सोख देता है ..ममा के परसादी से भाचा बाँच गे औ राजिम बस्ती भी..
          राजिम में माघ पुन्नी का मेला भराया ..तो सब भांचा भतरा सकला जाते ... ममा घर जाबो कोरर बरा खाबो...ममा के सायकिल डंडी में बैठ बैठे वहा.दुरिया से महानदी पुलिया दीखता रहा...महानंदी के ठंडा नीला पानी में..ले  भांचा मार डुबकी  ...बुडुक बुडुक ...मामा डूब जाऊंगा न ..नई डुबस बे ..मै तो हो ..चला हाथ गोड ..खिर्रर्र से हंसी मामा की..तौरना सीखना हे के नहीं. ..स्नान ध्यान के बाद कुलेश्वर दर्शन पाछू राजीव लोचन.. इहि  केदार इहि बद्री धाम ...
             और  मेला मैदान ...खचा खच ...सब माल दू रुपिया....माला मुंदरी से लेकर बन्दुक बौन्सुरी तक ..सब माल दू रूपया ..वाह.. रचोली नई हवाई झुला चढ़ेंगे मामा ,,बड ऊँचा हे भांचा डर्रा जबे.. फेर झुला जो उपर चढ़ा तो राजिम नवापारा का पूरा लाईट बग्ग बग्ग करता ..अब मामा डर्रा गए ..रोको रोको ..भांचा हंस रहा है...रात गए  टूरिंग टाकिज का सिनेमा...नदिया के पार..रेती में चद्दर बिछा के मामा बीडी फूक रहे है..कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया..सो गेस का भांचा ..अच्छा कल हिम्मत वाला दिखाहू ..तोर ढिसुम ढिसुम ..पानी टपकत हे सिनेमा खतम चलो रे
                   अब तो कुम्भ का अमृत बरसता है राजिम में कुलेश्वर और राजिम लोचन जुड़ गए मुरमी रोड से ..और नदिया ..अब कुण्ड है ..शाही स्नान ..शाही पोस्टर .और शाही मेला...पानी भी हरिया गया है..ठाकुर पुजेरी कहता है .अब तो पूरा च नई आये महराज ..तो काला भांचा डूबय काला ममा बचाय...परेम सिरा गे हे ..ममा भांचा दुन्नो सज धज के अपन अपन ग्राहिकी देखथे मेला में...खिर्रर्र अजीब सी हंसी हँसा पुजेरी....इन दिनों राजिम वाले मामा जी भी बीमार है ...मिलने पर पता चला फेफड़े का संक्रमण है ...मामा रायपुर में दिखाईये ...मेरी छुट्टी नहीं है नही तो आपको साथ ही ले चलता  ....मामा जी हंस दिए ..खिरर्र......लगा कह रहे हों ..भांचा डूबत हो ..बचा ले
अनुभव
                 
    
                            

Friday, May 23, 2014

बचपन का पेड़

बचपन का पेड़
गजब सिस्टम है भाई...अब पेड़ काट के बगीचा बनता है ..मोर्निग वाक के लिए टाईल वाला रास्ता..बच्चो के लिए झुला फिसलपट्टी ..दौड़ धुप के सुस्ताने के लिए सीमेंट का कुर्सी और रंग बिरंगी फुल पौधा का तिरछा इन्ट का  क्यारी ...बचे में हरे घास का लान और फौवारा...ऐसे में कोई सूखा बूढ़ा झाड़ कंहा फिट होगा ...सो कल ये सूखा आम का पेड़ कटने वाला है...
                       लेकिन कभी ये आम का झाड ही पूरा बागीचा था हमारा..गरमी की छुट्टी इसी झाड़ पे सबसे पहिले महकती और कुहुकती थी...की सारा माहोल ही बौरा जाता ..छोटा छोटा गोटा पथरा से मोहल्ले भर के अर्जुन चिड़िया की आंख के लक्छ बेधन प्रेक्टिस में लग जाते..संजू का निशाना सटीक था ..एक गोटा में दू चार हरे आम लस छोड़ते टपक पड़ते ..और साला अपना पथरा डन्गाली बीच से दूसरी ओर किसी प्रेक्टिस रत अर्जुन का माथा लाल कर देता...सो संजू के उपयोग हेतु उपयुक्त गोटा चुनाव का दायित्व ही लाभप्रद था...झाड़ के  बीच में एक  छोटा सा लान भी था..जन्हा से डाली फैली थी ठीक वन्ही..थोडा माटी जमा के घास उग गयी थी ..भरी दोपहर बैठक होती थी वन्ही...फ़िल्मी फोटू वाली ताश..अमिताभ के ऊपर जिसका अमिताभ आये वो जीते..मिथुन पे मिथुन...खेल समाप्ति तक संजू का मिथुन इधर सकला गया..और अपना अमिताभ उसकी गड्डी में ..यानि पराजय...
              झाड़ ऐसे जय पराजय के बहुत से एपिसोड का साक्छी था..स्टम्प तो हमें लेना ही नही पड़ा कभी..चाहे विदेशी मोहल्ले की टीम का टूर क्यू न हो..झाड़ में उकेरी तीन डंडी शास्वत स्टम्प थी जिसकी गिल्ली कभी नही गिरी..इसी के तले पानी में भीगी कटोर कार्क की बाल के प्रहारों को झेला जो पेड तो छोडो बिना गार्ड के छुपे अंग की ओर बिजली की तरह लपकती थी..मारो य  फिर मरवा लो के अंदाज में..जो पहिले बल्ला भी न पकड़ पाए वो भी आत्म सुरक्छा में तेंदुलकर बन गया...आखिर में  हारा हुआ कप्तान अपने पराजय दस्तावेज पे हस्ताक्छर करता था..दस रुपये की राशी सहित ..जो इसी पेड़ के नीचे समोसा भजिया में उड़ा दी जाती...
                      पेड़ तो बुजुर्ग था फिर भी कई नवजात प्रेमियों के उगती प्रेम कथाओ को उसने सहारा दे रक्खा था. शाम के धुन्धकले में..ट्यूशन से लौटती कई राधाओ के कृष्ण यंहा सुरक्छित और असफल  प्रणय निवेदन करते..और मुह लुकवा टाइप प्रेमी पेड़ के उपर ही अपने प्रेमिका का नाम उत्कीर्ण कर उसे एक शास्वत अभिलेख में बदल देते...संजू के साथ ऐसी कई प्रेम कथाओ का आलोचनात्मक समिक्च्छा यंहा हमने की साथ ही अपनी जवानी के सम्भावित सपने भी संजोये..फिर एक दिन वो जवानी भी आ गयी जिसके पास अब पेड़ के नीचे रुकने का समय नही था ...
           और पेड़ के नीचे जो बचपन था उसकी दोपहर ऐसी कमरों में वीडियो गेम तक सिमट गयी थी..वो तब भी बौराता रहा था..पर बगीचे से पत्थर ही बिखर गए थे...शायद इसी लिए अब वो पेड़ भी बुढा गया था सूख गया था....कल वो कटने वाला था मन नहीं माना तो कैसे भी उसके सूखे तने के बीच फिर चढ़ गया..देखा आज भी उस ठूंठ के बीच वो हरी घांस उगी है..संजू भी अब रहा नही पर हमारे कुरेदे निशान अब भी धुंधले हुए बचे है ...उस बूढ़े पेड़ ने अब भी हमारे बचपन को सहेजे हुए रखा था एक माँ की तरह ...वो बचपन जो  कल कट जायेगा उस पेड़ के साथ....
अनुभव

                   

Sunday, April 27, 2014

लुट गया खजाना

लुट गया खजाना
भेंखू कहता है राजा तरिया में हंडिया है ..खजाना गडियाया था राजा ने हडिया में....पूरा गाव जानता है ..बात पूरानी है .जब फुलझर राज के राजा ने गाव में खुदवाया था ये बड़ा तरिया ...आल ओउलद नहीं था सो यग्य हवन किया और सारा  खजाना गडिया दिया ..दू आदमी का बलि दिया था वो समय ...तो आज भी  हर साल दू आदमी को खीँच देता है खजाना वाला हडिया..
          रात को गुम्म्म्म्म्म्म्म्म गुम्म्म्म्म्म्म सांकल बाजता है तरिया में ...गाव वाला जानता है संझकेरा बाद नई उतरना है पानी में ...लेकिन जो पौ फटा.. तो ये घाट से वो तरी तक जान दे .. गाव भर का मनखे गुड़ाखू मंजन घिसते मारे सकला जाता है.खेती किसानी से लेकर राजनीती तक का चर्चा होता है इन्हा .नंगरा लईका मन का रेला ..पचरी से कूदता है हरियर पानी में .फचाक ..नोनी दाई लोग पोलका छाती में बांधे  डुबकी  मारते है और कल  के डुबकी कढ़ी का सुवाद  गोठियाते है .जो अब नल ट्यूब बेल आ गया तो ठीक...नयी तो ईही पानी पीओ.. इहि पानी धोवो...
                          आधा पचरी के बाद ओ किनारा तक ताड़ बबूल का भारी झाड़ी झंखार है ..तरिया किनारे किनारे ..कांटा कुंटी के मारे गाय गरवा भी नई जाता ओ सोझ...कमल कमुदनी और कुम्भी लटाया है पानी में ..ओउ अजब गजब परेवा पंछी ..काला सफ़ेद ऐरी..बत्तख ..पनडुब्बी .कोकडा.मच्छरंगा....झुण्ड का झुण्ड डुबकी मारते .. पंखा सुखाते...बिहनिया से संझकेरा तक . ढंग ढंग का आवाज ..टीही टीही टिटुक ...गाव के सियानं कहते है ये परेवा पंछी सैनिक है .खजाना के रखवार ..मारना मना है इनको ..जाड में लाल मुड़ी वाला बत्तक्ख भी तो आता है .साल भर का हिसाब किताब लेने ..राजा का खबरी .. फेर आज कल के गावं का लईका मन का बिचार अलग है जो खजाना है तो बौरो ...साला दू ट्यूब वेल डाल के पानी पलो दो खेत कोति..  हडिया अपनेच आप उफल जायेगा .... फेर क्या ..सब लाल..निस्तारी के लिए दू तालाब और तो है
                             बात लग गया ...गरमी के धान में जो पानी पलोया के सब ट्यूब वेल फेल...राजा तरिया का भी पानी सोखा रहा है तली का चिकना माटी दिखता है ..ये बड़ा बड़ा दरार...वो किनारा माँ होहि सरपंच ..जतका बांचे पानी है बोहा दो..और आखिर तरिया ख़ाली हो गया ....फेर  हंडिया.. हडिया नहीं उफला..गावं वाला कहते है खजाना था सरपंच अकेल्ला लूट दिया ...देख ले ललिया गया है नवा हौंडा असप्लेंडर बिसाया है...उधर सुक्खा उजाड़ तरिया में धुर्रा उड़ रहा है..पचरी सुन्ना...कोई हे बक बक नही..पंछी परेवा सब उड़िया गिया ..सच तो है लुट गया खजाना ..
अनुभव
               

Saturday, April 12, 2014

सुख दुःख की रंगीन टोकरी

सुख दुःख की रंगीन टोकनी
..स्कुल की दीवार से लगकर थी रेवा दाई की बैठक...उस कोने को कभी खाली ही नही देखा था..सुबह पाली की प्रार्थना से पहल्रे ही छाते के नीचे टोकरी जो सज जाती तो फिर शाम की घंटी बजने तक  अनवरत जारी ...उस जादू की टोकरी में एक पूरा खट्टा मीठा संसार बसता था..पिटे हुए विद्यार्थियों के लिए ठंडी हरी सत की गोली..या तीखा  काला चूरन...चटखारी लडकियों के लिए कच्ची इमली और खड़ा नमक..उबाऊ क्क्छाओ के बीच राहत देंने वाली बोइर कूट की डंडी ..या फिर उंगलियों में फ़सने वाला गर्बीला नड्डा ..जो मुह से लग कर तो गरजता था फिर यु घुल जाता की जैसे कुछ खाया भी की नहीं.गजब की विविधता.सुख दुःख के स्वादो को समेटती एक रंगीन दुनिया...दोपहर की बड़ी रिशेस में रेवा बाइ के गिर्द एक घेरा बन जाता..पांच पैसे से लेकर एक रूपये तक का लम्बा व्यापार..फिर भी पाई पाई का ऐसा पक्का हिसाब की खरीदी के पहले ही ग्राहक का अकाउंट स्टेटमेंट निकल आता..तोर कल के पचास पैसा बाचे हे..कलिंदर के चानी नयी खाए रहेस..इंकार की कोई गुंजाईश ही नही.स्कुल में तो फिर चल भी जाये..यंहा तो हाजरी देनी ही होगी..गुरूजी से ज्यादा रोब था रेवा का..सो हर विद्यार्थी का केरेक्टर सर्टिफिकेट यंहा से भी जारी होता था..तै महराज के लईका ओकर संग झन खेले कर...बदमाश हे वो टूरा ह..हेडमास्टर का चेहरा तो अब कुछ धुंधला भी गया पर रेवा का वो बड़ा लाल टीका और गोदने से भरा चेहरा आज भी याद है
                              यूँही एक बार थोडा झिझकते हुए गाड़ी उस किनारे रोक ली..बूढी रेवा वैसे ही जमी हुई...पर आज भी  उतनी ही तेज याददाश्त ...उसने पूरा बचपन उलद दिया ..आज के साहब बनने की नीव खोद रही थी..तैं ता शुरू ले होशियार रहेस..व्यापार पे भी चर्चा जरूरी थी सो बोली..अब नई रह गे महराज ..सामने दुकान खुले ले पहिली जैसन कंहा रिहि..समोसा बर्गर के सामने खस्ता नड्डा ध्वस्त हो गए थे...चमकीली रेपर वाली चाकलेटो के सामने पीपी गोलियों के रंग फीके पड गए..काफी कुछ बदल गया था... पर अर्थव्यवस्था के चढ़ाव का इतना ही असर उस रगीन टोकने में हुआ था की चवन्नी अट्ठनी की सीमा  अब रूपये से पांच रूपये तक पहुच गयी थी..लेकिन जो नहीं बदला था वो था रेवा का मिजाज..बोइर कूट हाथ में धरते हुए बोली ..तोर   लईका मन बर हे महराज..अभी पैसा झन दे ..उधारी में रीही ..फेर आबे

अनुभव

Saturday, April 5, 2014

फेर फर जा रे महुआ

फेर फरही महुआ.....
फागुन लगे में महुहारी जाड ....टप्प टप्प गिरता है महुआ झाड़ से फल ..बिहिनिया बिहिनिया.. .चक पिउंरा..अउ रसा भरे गुल्ला...चलो रे...पूरा गाव जंगल में सकला गया...टोकनी थैला लिए...दूर तक फैली मदमस्त सुगंध...
                   सूंघता हुआ लम्बी थूथन वाला काला भालू भी उतरता है पहाड़ी से मचकते मचकते....आखिर उसका भी हिस्सा है इस खजाने में..तो जन्हा हिस्सेदारी है वंहा झगरा लड़ाई भी..पर साल सोखवा को महुआ झाड़ पास भलुवा भेटा गया...सोखवा का तेंदू लौठी नींग दिया .. भागा सोखुवा फेर भलुवा को  पायेगा .. दुनो पैर बिच टांग चेप भकरस ले मुड़ भसरा गिरा दिया  .. जो ककोमाँ ..ता सारा ..पूरा चुंदी मुड़ी झूल गे....लहूलुहान...आज भी घाव ले लहू बोहाता है...फेर वाह रे महुआ .... पहिला कुनकुना धार मारो ..दरद पीरा सब फुर्र्र..
                       गावं भर में जियादा सेन्तु बैगा बिनता है महुआ ..काहे ... बघवा के परसादी ले.. जंहा गावं वाला घुसा जंगल भीतरी वन्ही ...झारी के पाछू दहाड़ा बघवा..भागो रे  ..बड़े जान बघवा ..कोन देखिस रे..रेचका हर ..आवाजे भर सुने हों फेर पोटा कांप गे ददा....ये हर बस ककोमे नही.. टोटा ल धर के खिंच दिही ...पूरा गावं भीतरिया गया...खार में बघवा आ गे हे.....फेर सेन्तु बैगा के  अंगना में टोकना टोकना महुआ...गावं वाले जानते है...सेन्तु बघवा ल ऐसन फूक मारथे के बघवा डिगे नहीं बांध देथे ...जतका बिनना है बिन .पूरा गावं वाला बैगा से गोहार लगईस...तब जा के डोंगरी खार को बांधा सेन्तु बैगा....मजाल फेर बघवा के जो आये...बिनो रे खतरा टल गे हे..
            त्रिलोचन गुप्ता के किराना दूकान में मार महुआ गोंजाय हे ..बोरा बोरा ..सुखा महुआ पांच रूपया किलो..ताजा तीन रूपया...सेन्तु के अंगना जैसे दस अंगना भर सूखता हुआ महुआ...पूरा गावं भर का कर्जा उधारी छोटाता है ईही टाइम..सोखवा पर साल इलाज पानी के लिए दस हजार कर्जा लिया ब्याज किये अठारह हुआ...गुप्ता सेठ गुसिया गया है... ये दारी का पैसा टप्प टप्प उठा रहा है ..पुराना कोंन चुकाएगा रे..भालुवा बघवा से डर्रायेगा तो कैसे छुटेगा करजा...सोखवा अपने घाव पे हाथ फेरते बोला...छोंट दूंगा...सोखवा सोचता है...भालुवा बघवा का घाव तो भरा भी जाए..सेठ का करजा कैसे भारयेगा....फेर फर जा रे महुआ
अनुभव