Friday, May 23, 2014

बचपन का पेड़

बचपन का पेड़
गजब सिस्टम है भाई...अब पेड़ काट के बगीचा बनता है ..मोर्निग वाक के लिए टाईल वाला रास्ता..बच्चो के लिए झुला फिसलपट्टी ..दौड़ धुप के सुस्ताने के लिए सीमेंट का कुर्सी और रंग बिरंगी फुल पौधा का तिरछा इन्ट का  क्यारी ...बचे में हरे घास का लान और फौवारा...ऐसे में कोई सूखा बूढ़ा झाड़ कंहा फिट होगा ...सो कल ये सूखा आम का पेड़ कटने वाला है...
                       लेकिन कभी ये आम का झाड ही पूरा बागीचा था हमारा..गरमी की छुट्टी इसी झाड़ पे सबसे पहिले महकती और कुहुकती थी...की सारा माहोल ही बौरा जाता ..छोटा छोटा गोटा पथरा से मोहल्ले भर के अर्जुन चिड़िया की आंख के लक्छ बेधन प्रेक्टिस में लग जाते..संजू का निशाना सटीक था ..एक गोटा में दू चार हरे आम लस छोड़ते टपक पड़ते ..और साला अपना पथरा डन्गाली बीच से दूसरी ओर किसी प्रेक्टिस रत अर्जुन का माथा लाल कर देता...सो संजू के उपयोग हेतु उपयुक्त गोटा चुनाव का दायित्व ही लाभप्रद था...झाड़ के  बीच में एक  छोटा सा लान भी था..जन्हा से डाली फैली थी ठीक वन्ही..थोडा माटी जमा के घास उग गयी थी ..भरी दोपहर बैठक होती थी वन्ही...फ़िल्मी फोटू वाली ताश..अमिताभ के ऊपर जिसका अमिताभ आये वो जीते..मिथुन पे मिथुन...खेल समाप्ति तक संजू का मिथुन इधर सकला गया..और अपना अमिताभ उसकी गड्डी में ..यानि पराजय...
              झाड़ ऐसे जय पराजय के बहुत से एपिसोड का साक्छी था..स्टम्प तो हमें लेना ही नही पड़ा कभी..चाहे विदेशी मोहल्ले की टीम का टूर क्यू न हो..झाड़ में उकेरी तीन डंडी शास्वत स्टम्प थी जिसकी गिल्ली कभी नही गिरी..इसी के तले पानी में भीगी कटोर कार्क की बाल के प्रहारों को झेला जो पेड तो छोडो बिना गार्ड के छुपे अंग की ओर बिजली की तरह लपकती थी..मारो य  फिर मरवा लो के अंदाज में..जो पहिले बल्ला भी न पकड़ पाए वो भी आत्म सुरक्छा में तेंदुलकर बन गया...आखिर में  हारा हुआ कप्तान अपने पराजय दस्तावेज पे हस्ताक्छर करता था..दस रुपये की राशी सहित ..जो इसी पेड़ के नीचे समोसा भजिया में उड़ा दी जाती...
                      पेड़ तो बुजुर्ग था फिर भी कई नवजात प्रेमियों के उगती प्रेम कथाओ को उसने सहारा दे रक्खा था. शाम के धुन्धकले में..ट्यूशन से लौटती कई राधाओ के कृष्ण यंहा सुरक्छित और असफल  प्रणय निवेदन करते..और मुह लुकवा टाइप प्रेमी पेड़ के उपर ही अपने प्रेमिका का नाम उत्कीर्ण कर उसे एक शास्वत अभिलेख में बदल देते...संजू के साथ ऐसी कई प्रेम कथाओ का आलोचनात्मक समिक्च्छा यंहा हमने की साथ ही अपनी जवानी के सम्भावित सपने भी संजोये..फिर एक दिन वो जवानी भी आ गयी जिसके पास अब पेड़ के नीचे रुकने का समय नही था ...
           और पेड़ के नीचे जो बचपन था उसकी दोपहर ऐसी कमरों में वीडियो गेम तक सिमट गयी थी..वो तब भी बौराता रहा था..पर बगीचे से पत्थर ही बिखर गए थे...शायद इसी लिए अब वो पेड़ भी बुढा गया था सूख गया था....कल वो कटने वाला था मन नहीं माना तो कैसे भी उसके सूखे तने के बीच फिर चढ़ गया..देखा आज भी उस ठूंठ के बीच वो हरी घांस उगी है..संजू भी अब रहा नही पर हमारे कुरेदे निशान अब भी धुंधले हुए बचे है ...उस बूढ़े पेड़ ने अब भी हमारे बचपन को सहेजे हुए रखा था एक माँ की तरह ...वो बचपन जो  कल कट जायेगा उस पेड़ के साथ....
अनुभव

                   

Sunday, April 27, 2014

लुट गया खजाना

लुट गया खजाना
भेंखू कहता है राजा तरिया में हंडिया है ..खजाना गडियाया था राजा ने हडिया में....पूरा गाव जानता है ..बात पूरानी है .जब फुलझर राज के राजा ने गाव में खुदवाया था ये बड़ा तरिया ...आल ओउलद नहीं था सो यग्य हवन किया और सारा  खजाना गडिया दिया ..दू आदमी का बलि दिया था वो समय ...तो आज भी  हर साल दू आदमी को खीँच देता है खजाना वाला हडिया..
          रात को गुम्म्म्म्म्म्म्म्म गुम्म्म्म्म्म्म सांकल बाजता है तरिया में ...गाव वाला जानता है संझकेरा बाद नई उतरना है पानी में ...लेकिन जो पौ फटा.. तो ये घाट से वो तरी तक जान दे .. गाव भर का मनखे गुड़ाखू मंजन घिसते मारे सकला जाता है.खेती किसानी से लेकर राजनीती तक का चर्चा होता है इन्हा .नंगरा लईका मन का रेला ..पचरी से कूदता है हरियर पानी में .फचाक ..नोनी दाई लोग पोलका छाती में बांधे  डुबकी  मारते है और कल  के डुबकी कढ़ी का सुवाद  गोठियाते है .जो अब नल ट्यूब बेल आ गया तो ठीक...नयी तो ईही पानी पीओ.. इहि पानी धोवो...
                          आधा पचरी के बाद ओ किनारा तक ताड़ बबूल का भारी झाड़ी झंखार है ..तरिया किनारे किनारे ..कांटा कुंटी के मारे गाय गरवा भी नई जाता ओ सोझ...कमल कमुदनी और कुम्भी लटाया है पानी में ..ओउ अजब गजब परेवा पंछी ..काला सफ़ेद ऐरी..बत्तख ..पनडुब्बी .कोकडा.मच्छरंगा....झुण्ड का झुण्ड डुबकी मारते .. पंखा सुखाते...बिहनिया से संझकेरा तक . ढंग ढंग का आवाज ..टीही टीही टिटुक ...गाव के सियानं कहते है ये परेवा पंछी सैनिक है .खजाना के रखवार ..मारना मना है इनको ..जाड में लाल मुड़ी वाला बत्तक्ख भी तो आता है .साल भर का हिसाब किताब लेने ..राजा का खबरी .. फेर आज कल के गावं का लईका मन का बिचार अलग है जो खजाना है तो बौरो ...साला दू ट्यूब वेल डाल के पानी पलो दो खेत कोति..  हडिया अपनेच आप उफल जायेगा .... फेर क्या ..सब लाल..निस्तारी के लिए दू तालाब और तो है
                             बात लग गया ...गरमी के धान में जो पानी पलोया के सब ट्यूब वेल फेल...राजा तरिया का भी पानी सोखा रहा है तली का चिकना माटी दिखता है ..ये बड़ा बड़ा दरार...वो किनारा माँ होहि सरपंच ..जतका बांचे पानी है बोहा दो..और आखिर तरिया ख़ाली हो गया ....फेर  हंडिया.. हडिया नहीं उफला..गावं वाला कहते है खजाना था सरपंच अकेल्ला लूट दिया ...देख ले ललिया गया है नवा हौंडा असप्लेंडर बिसाया है...उधर सुक्खा उजाड़ तरिया में धुर्रा उड़ रहा है..पचरी सुन्ना...कोई हे बक बक नही..पंछी परेवा सब उड़िया गिया ..सच तो है लुट गया खजाना ..
अनुभव
               

Saturday, April 12, 2014

सुख दुःख की रंगीन टोकरी

सुख दुःख की रंगीन टोकनी
..स्कुल की दीवार से लगकर थी रेवा दाई की बैठक...उस कोने को कभी खाली ही नही देखा था..सुबह पाली की प्रार्थना से पहल्रे ही छाते के नीचे टोकरी जो सज जाती तो फिर शाम की घंटी बजने तक  अनवरत जारी ...उस जादू की टोकरी में एक पूरा खट्टा मीठा संसार बसता था..पिटे हुए विद्यार्थियों के लिए ठंडी हरी सत की गोली..या तीखा  काला चूरन...चटखारी लडकियों के लिए कच्ची इमली और खड़ा नमक..उबाऊ क्क्छाओ के बीच राहत देंने वाली बोइर कूट की डंडी ..या फिर उंगलियों में फ़सने वाला गर्बीला नड्डा ..जो मुह से लग कर तो गरजता था फिर यु घुल जाता की जैसे कुछ खाया भी की नहीं.गजब की विविधता.सुख दुःख के स्वादो को समेटती एक रंगीन दुनिया...दोपहर की बड़ी रिशेस में रेवा बाइ के गिर्द एक घेरा बन जाता..पांच पैसे से लेकर एक रूपये तक का लम्बा व्यापार..फिर भी पाई पाई का ऐसा पक्का हिसाब की खरीदी के पहले ही ग्राहक का अकाउंट स्टेटमेंट निकल आता..तोर कल के पचास पैसा बाचे हे..कलिंदर के चानी नयी खाए रहेस..इंकार की कोई गुंजाईश ही नही.स्कुल में तो फिर चल भी जाये..यंहा तो हाजरी देनी ही होगी..गुरूजी से ज्यादा रोब था रेवा का..सो हर विद्यार्थी का केरेक्टर सर्टिफिकेट यंहा से भी जारी होता था..तै महराज के लईका ओकर संग झन खेले कर...बदमाश हे वो टूरा ह..हेडमास्टर का चेहरा तो अब कुछ धुंधला भी गया पर रेवा का वो बड़ा लाल टीका और गोदने से भरा चेहरा आज भी याद है
                              यूँही एक बार थोडा झिझकते हुए गाड़ी उस किनारे रोक ली..बूढी रेवा वैसे ही जमी हुई...पर आज भी  उतनी ही तेज याददाश्त ...उसने पूरा बचपन उलद दिया ..आज के साहब बनने की नीव खोद रही थी..तैं ता शुरू ले होशियार रहेस..व्यापार पे भी चर्चा जरूरी थी सो बोली..अब नई रह गे महराज ..सामने दुकान खुले ले पहिली जैसन कंहा रिहि..समोसा बर्गर के सामने खस्ता नड्डा ध्वस्त हो गए थे...चमकीली रेपर वाली चाकलेटो के सामने पीपी गोलियों के रंग फीके पड गए..काफी कुछ बदल गया था... पर अर्थव्यवस्था के चढ़ाव का इतना ही असर उस रगीन टोकने में हुआ था की चवन्नी अट्ठनी की सीमा  अब रूपये से पांच रूपये तक पहुच गयी थी..लेकिन जो नहीं बदला था वो था रेवा का मिजाज..बोइर कूट हाथ में धरते हुए बोली ..तोर   लईका मन बर हे महराज..अभी पैसा झन दे ..उधारी में रीही ..फेर आबे

अनुभव

Saturday, April 5, 2014

फेर फर जा रे महुआ

फेर फरही महुआ.....
फागुन लगे में महुहारी जाड ....टप्प टप्प गिरता है महुआ झाड़ से फल ..बिहिनिया बिहिनिया.. .चक पिउंरा..अउ रसा भरे गुल्ला...चलो रे...पूरा गाव जंगल में सकला गया...टोकनी थैला लिए...दूर तक फैली मदमस्त सुगंध...
                   सूंघता हुआ लम्बी थूथन वाला काला भालू भी उतरता है पहाड़ी से मचकते मचकते....आखिर उसका भी हिस्सा है इस खजाने में..तो जन्हा हिस्सेदारी है वंहा झगरा लड़ाई भी..पर साल सोखवा को महुआ झाड़ पास भलुवा भेटा गया...सोखवा का तेंदू लौठी नींग दिया .. भागा सोखुवा फेर भलुवा को  पायेगा .. दुनो पैर बिच टांग चेप भकरस ले मुड़ भसरा गिरा दिया  .. जो ककोमाँ ..ता सारा ..पूरा चुंदी मुड़ी झूल गे....लहूलुहान...आज भी घाव ले लहू बोहाता है...फेर वाह रे महुआ .... पहिला कुनकुना धार मारो ..दरद पीरा सब फुर्र्र..
                       गावं भर में जियादा सेन्तु बैगा बिनता है महुआ ..काहे ... बघवा के परसादी ले.. जंहा गावं वाला घुसा जंगल भीतरी वन्ही ...झारी के पाछू दहाड़ा बघवा..भागो रे  ..बड़े जान बघवा ..कोन देखिस रे..रेचका हर ..आवाजे भर सुने हों फेर पोटा कांप गे ददा....ये हर बस ककोमे नही.. टोटा ल धर के खिंच दिही ...पूरा गावं भीतरिया गया...खार में बघवा आ गे हे.....फेर सेन्तु बैगा के  अंगना में टोकना टोकना महुआ...गावं वाले जानते है...सेन्तु बघवा ल ऐसन फूक मारथे के बघवा डिगे नहीं बांध देथे ...जतका बिनना है बिन .पूरा गावं वाला बैगा से गोहार लगईस...तब जा के डोंगरी खार को बांधा सेन्तु बैगा....मजाल फेर बघवा के जो आये...बिनो रे खतरा टल गे हे..
            त्रिलोचन गुप्ता के किराना दूकान में मार महुआ गोंजाय हे ..बोरा बोरा ..सुखा महुआ पांच रूपया किलो..ताजा तीन रूपया...सेन्तु के अंगना जैसे दस अंगना भर सूखता हुआ महुआ...पूरा गावं भर का कर्जा उधारी छोटाता है ईही टाइम..सोखवा पर साल इलाज पानी के लिए दस हजार कर्जा लिया ब्याज किये अठारह हुआ...गुप्ता सेठ गुसिया गया है... ये दारी का पैसा टप्प टप्प उठा रहा है ..पुराना कोंन चुकाएगा रे..भालुवा बघवा से डर्रायेगा तो कैसे छुटेगा करजा...सोखवा अपने घाव पे हाथ फेरते बोला...छोंट दूंगा...सोखवा सोचता है...भालुवा बघवा का घाव तो भरा भी जाए..सेठ का करजा कैसे भारयेगा....फेर फर जा रे महुआ
अनुभव

Monday, March 10, 2014

बाप की जमींन

बाप की जमींन (महिला दिवस को समर्पित)
भूखिन बाई  के पोपले मुह में दो दांत ही  थे  कील की तरह होंठो के बीच से उभरे हुए..अपनी सूखती जीभ को वो बार बार लार से लपेट लेती थी चप चप ..मकड़ी के जाले सी लकीरों से भरा चेहरा... लकीरे एक शिरोरेखा सी...जिस पे कुछ लिखा हो ..और मिट गया हो
               कांसू पर्रा ल भीतरिया दे ..चप चप...फेर झरी परही ..झप्पर से रिझता पानी ...बेमौसम...चना में कीरा परही कांसू ...ये मौसम में भजिया खात रिहिस मोर बाप ...भूखिन इकलौती थी छोटी सी अपने बाप की उंगली पकड़ जब खेत जाती ..देख तोरे जमींन हे बेटी...फूल जाती थी भूखिन..मोर बाप के जमींन मोर जमींन..ब्याह के बाद जमींन के साथ ही उसकी विदाई हुई ससुराल को
            भूखिन का घरवाला चना बोता था ...पांच एकड में हरियाते चने के छोटे छोटे पौधे....  रोज अपनी सास को याद दिलाती थी भूखिन .मोरे बाप के जमींन ले बोजत हो .सास के ताने का जवाब ..बाझिन रोगहि लईका नै दे सकस तो छोड़ दे मोर टूरा ल.. दिन भर की चकचक का.हिसाब रात को पति लेता था.. फेर एक दिन  भूखिन ने ही चूड़ी बदल ली ...अब उस जमीन में कांसू का बाप सब्जी भाजी उगाने लगा ..बेटा हुआ गए में हुई कांसू...बाप के बाद अब बेटा कमाता है...बहु  आई सो फिर पुरानी कहानी आघे बढ़ी  ...डोकरी मरे नहीं ..डोमी कस बैठ गे हे..भुखिन्न का वही पुराना अजमाया जुमला ..एकर नै मोर बाप के जमींन हे ..तेकर बल में तिरर्तिरात हस अतका.. ..तै टार अपन मुहु ल हम नै मरन..अपन बेटी ल दे देबो जा.. माँ के मीठे दुध का सुवाद भुला जाता है कड़वे बोल ने बेटे को जरजरा दिया..डोकरी तोर बाप के  हे तो का कब्ज़ा तो मोरे हे ..फेर आज नहीं तो काल मरबे..के ले के जाबे साथ में.
       ..तहसील में कासु का हाथ धरे गयी भुखिंन ..मोतियाबिंद भरी आंखे झरने लगी..तै पूरा जमीन ल मोर बेटी के नाम कर दे साहेब....भगवान टुरी जात के किसमत में लात ही लिखे हे ठीक हेबफेर बोल तो पाही मोर माँ के जमीन ..अतका  भरोसा में ही काट लेही...कासू पर्रा भितरा रही है... कासु पटवारी आईस क..कब्ज़ा दिलवाए बर...खटिया में बैठ कर भूखिन बडबडा रही है ...मोर बाप के जमीन
अनुभव

Sunday, March 2, 2014

मुंडू ठेठवार का परेत

मुंडू ठेठवार का परेत
मुंडू ठेठवार पर चार हजार की उधारी थी बट्टू गोउठिया रोज पेराहि देते थे..मुंडू ने सिलयारी भट्टी में दो बोतल मसाला ठर्रा चढ़ाया..रात दस ग्यारह बजे रहे होंगे अगार खार के तरिया उपर वाले अमली पेड़ के नीचे टुनकी में लेट लिया ...फेर सुबह दुकलहा लोटा लिए जा रहा था ..देखता क्या है मुंडू का आंखी कान तिरिया गया है मुहु से फ़ेना मारा है...मुंडू निपट लिया..करजा बाड़ी के साथ...वो दिन है और आज.. अमली झाड़ के आस पास जो भी गए रात फटका ..मुंडू ठेठवार का परेत उसको धरता च है ...सोखवा ऊपर दल्लू साहू का दो गाडा धान अधिया का वसूली बाकी था...सायकिल टेरते आता रहा की भसरंग से मुंडु केरियर में कूदा ...और चपक दिया दुनो हाथ से...साँस लटक गयी ..छाती फूल गयी...अगले दिन से सोकवा आंखी तरेरे सारे गाव गली झूमता रहता.. दल्लू साहू को बखानता..तोर.. दल्लू नै छोड़व रे..मै हो रे मुंडू ..तोर ...दल्लू ...कोइ पास फटका की चप्प ले धरा...बैगा के पास दस आदमी ठोंस के ले गए...मिरचा का धुन्गिया मार ...नीम का सांटी से जो सोंटा जो पीठ में लाल रोला उपक गया..फेर मुंडू है की जाए नहीं...तोर दल्लू ...दो मुर्गा कांट ..दो बोतल मसाला चघा..फेर मुंडू नै डिगा..आखिर बैगा बोला दल्लू को बुलावो...देख रे दल्लू ये मुंडू का परेत है ..उधारी पानी छोड़े बिना नै जायेगा...छोड़ नै तो अभी बखानता है कल को एकात बार अकेले में चेप दिया तो तेरा टोटा च मसकेगा....दल्लू पसीना पसीना..बोला छोड़ दे रे सोकवा को मुंडू...उधारी छोड़ रहा हु..लबारी मारू तो मेरे को लोकवा मारे...अचानक सोकवा जोर जोर से हिल्लोरा मारा ..मुहु से दे फेना..और एक तरफ लुढ़क गया..मुंडू परेत उतर गिया..तीन दिन गए सोकवा एकदम ठीक ..फिर दल्लू घूर के देखे जरुर पर कभी उधारी का जिकर नै किया...तब से गाव में कोई उधारी नै देता....साला सभी कर्जा दार को मुंडू ठेठवार धर देता है..बोल के भी मांगे तो भी नै देना..नै धरेगा दाऊ मेरेको नै धरेगा..लौटा दूंगा ..दे दे पर कौन भरोसा भुत परेत का ..स्टाम्प लिखा पढ़ी सब फेल..गाव वाला कापरेटिव बैंक मनेजर बदली का अरजी दिया है..रिपोट में लिखा गाव में मुडू परेत है सो लोन नै बाट सकते
अनुभव

Thursday, March 7, 2013

अरा जरा बिटिया का प्यार ,,,,,,,,,

छुटपन की एक घटना मुझे आज भी भीगा देती है ,,उन दिनों हम लोग गर्मी की छुट्टियों में जांजगीर गए हुए थे ,,,मै जिन रिश्तेदार के घर था ,,उन्होंने बताया की वंहा के एक पारिवारिक मित्र ,,की माता मेरे गाँव कुकेरा से थी ,,,और वो हमसे मिलना चाहती हैं ,,अपनी माँ के साथ एक शाम ,,जब हम उनके घर पहुचे ,,तो हमारा परिचय कुकेरहींन दाई से हुआ ,,,आधी झुकी हुई बुजुर्ग महिला हमसे ऐसे मिली ,,जैसे कोई विदेश में अपने देश के लोगों से मिल रहा हो ,,वो ललक कर हमारे गालो को छूती ,,,और फिर गाँव के एक एक परिवार से अपना रिश्ता स्पष्ट करती,,सत्तर की उम्र की याददाश्त भी मानो फिर युवा हो गयी थी ,,फलाना मंदिर ,,फलाना कका,,,तालाब,,आम जामुन ,,उस एक घंटे में उन्होंने सब कुछ समेट दिया ,,,लम्बे समय से हमारे गावं की उस बेटी ने अपना पैत्रिक घर नहीं देखा था ,,,और शायद फिर देख भी न पाई हों ,,,,लेकिन जांजगीर में बसे अपने बड़े परिवार में घुली मिली उस बहु की बूढी आँखों में आज भी ,,कुकेरा से विदा हुई एक १४ साल की बेटी छुपी हुई थी ,,जो अपने गावं के बच्चो से मिलकर उन् पर वोह आत्मीयता बरसा रही थी ,,जिससे खुद उनके बच्चे कुछ अपरिचित लग रहे थे ,,,हमर गौरहा परिवार के लईका ,,, जाते वक्त उनकी आँखों में मैंने आंशु देखे मानो ,, दुल्हन अपने मायके से विदा हो रही हो ,,, आज उस मुलाकात को याद कर ,,महसूस होता है की अपने पित्र प्रधान सामाजिक ढांचे में हम भले ही अपने परिवार की विदा की बेटियों को उस शिद्दद से याद नहीं रखते ,,,पर वो बेटिया अपने परिवार में पूरी तरह डूब कर भी ,,,अपने भीतर अपने छोड़े हुए परिवार के प्यार को हमसे ज्यादा सहेजे रखती है ,,,जिसकी बारिश में उस दिन हम भीग गए ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,