Tuesday, May 16, 2023
Monday, March 6, 2023
आम्र नूनचरा
आम्र नूनचुरा,,,
रे ग्रीष्म !!! जब कर्क वृत में तुम दहकते हो,,तो ये दरख़्त बौराता है,,,वो खास शख्सियत बड़ा आम है ,,,फलों का शहंशाह ,,खैर कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है पर इन्ही बौरों से प्रस्फुटित होती है बिना चेर की चट्ट खट्टी केरियाँ ,,,, हरी ,,अपरिपक्व डंगालों में फागुन से लगकर सावन के झूले झूलती,,, हजरात इसी दौरे कमसिनी में,, जब इन्हें हिंदवीं मसालों के कलेवर सुपर्द कर दिया जावे तो कमाल न हो ,,ये मुमकिन नही,,,नुंनचरा ऐसी ही बंदिश है,, छिलके सहित ,,गुठली रहित जुवेनाइल आम्र और सरसों ,,दानों से सजे एक ऐसी जुगलबन्दी का,,,,जिसे झट बनाओ ,,सप्ताहान्त तक खाओ,,,कर्दम कुरदम,,कुरदम कर्दम,,,लिज़्ज़त लिज़्ज़त नूनचरा,,,
सफेद भात मदमस्त हो कर कह उट्ठे ,,कोई साक अब नही लगेगा,,बोरे बासी पर नावों सी उफल पड़ेगीं ,,,या फिर चपातियों में मसालों संग लपेट देवें ,,पोंगरी या थोड़े शिष्ट होकर कन्हे तो रोल अस के यशस्वी होगा जो ,,,लार ग्रन्थियों का अतिरेक तौलेंगी ,,,,
गर फिरदौस चटखारे कंही है,,तो यंही हैं यंही है यंही है ,,टाइप,, इन नुंनचरास की प्रथम खेप कीर्ति भाभी ने आज रिलीज़ की,,किसी जहीन ड्रेस डिजाइनर की तरह ,,और हमारी रसोईयां आत्मसमर्पण के सफेद झंडे के साथ प्रस्तुत हो गई,,,,खाँटी छत्तीसगढ़ी जज़्बातों का तरन्नुम,,,पेशे खिदमत है ,,,आम्र नूनचुरा
Friday, February 24, 2023
सुरेश मामा नही रहे,,,
ये वाक्य बड़ा अधूरा सा है वो,,मुस्कुराहट अब नही रही ,,तिरछी सी अधरों से गुब्बारों में पल प्रति पल फूटती ,,कमाल ये था कि शब्द पूरे नही पड़ते पर अर्थ कंही गहरे गोते लगाते,,,,,,मुझे एक दिन पूछा तुम मुछ कैसे उगा लिए,,मैंने कहा मामा जी थोड़ा मेंच्योड लगूंगा इस खातिर,,बोले फिर दाढ़ी भी गहरी होनी चाहिए गम्भीरता गहन हो जाएगी,,खैर मैंने सब कुछ मुड़वा दिया,, मामा जी उपमा ,,उत्प्रेक्छा के बड़े खिलाड़ी रहे,,,सहजता बड़ी खालिस वस्तु है,,जिसे देख कर लेना सहज लगता है पर सम्भालना बड़ा जटिल ,अनल मामा जी मे ये सहजता उतनी ही स्वाभाविक थी जितनी हरिशंकर परसाई में चुटीली तीव्रता,,या फिर सचिन तेंदुलकर में स्ट्रेट ड्राइव की कला,,,आज हमने एक खाँटी बाह्मन पारा का वो आदिम शख्श खो दिया जो पिछले मुलाकात में पूछ रहा था,,भांचा दुरुग में हो या दुर्ग में
Wednesday, February 15, 2023
Friday, February 3, 2023
प्रशासन में प्रेमचंद
प्रशासन में प्रेमचंद
शासन की नीतियों को धरातल पे लागू करने वाला औजार है प्रशासन,, जो जितना उन्नत होगा,,उतने ही लोक हित कारी परिणाम मिलेंगे,,ऐसे ठोस और व्यवहारिक छेत्र में महान कथाकार प्रेमचंद की सम्वेदनाओं की कल्पना पहली नजर में कुछ बेमेल सी जान पड़ती है,,,पर जरा गौर करें तो इस कल्पना में से कमाल की तस्वीर बनती है,,जो आज के प्रशासन को कई नए आयाम दे सकती हैं,
1936 के गोदान का होरी किसान आज भी भारत के गांवों में,,दो बीघे जमीन और सामाजिक मरजाद के बीच पीसता हुआ मिल जाता है,,हमारी तहसील और कलेक्ट्रेट में अर्जी लिए ,,,और उद्योगपति मिस्टर खन्ना आज भी जमीन अधिग्रहण कर खेतों को कारखानों में तब्दील करने के जतन में लगे हैं,,, प्रशासनिक अधिकारी इन दो भिन्न जिंदगियों के बीच आज अपनी नीतियों संग तालमेल बिठाते बैठा है,,जाहिर है होरी के दारिद्र ,,और मिस्टर खन्ना की महत्वाकांक्षा की पृष्ठभूमि जाने बिना,,हम कुछ बेहतर नही कर सकते,,,प्रेमचंद इन्ही गहरी सम्वेदनाओं को उकेरते है,,,,
Sunday, October 16, 2022
ममा बर के देखा
ममा,, बर के देखा ,,
पंचायत में अतिक्रमण हटाने का प्रस्ताव पारित भी हुआ ,,,और तहसीलदार साहेब सफेद सूमो में लहराते आये फिर,,,कैसे गाड़ी का बेरिंग टूटा,,,और पटवारी ,,आई आर समेत खातू गड्ढा में बोजा गए,,,प्रकरण खारिज,, दाखिल दफ्तर,,,रक्सा परेत संग लुवाठ कचहरी ,,
, इस बार टिंगू दाऊ के सरपंची चुनाव में मिर्धा के बोले आधा खाल्हे पारा पलट गया,,,दाऊ के ब्यारा खुरडी बोकरा पैरा में धीमा धीमा भुना रहा,,,चूल्हा में डबकता भात,,,परसा पत्ता के पतरी संग,, कतार में फ़सकराये कर्मठ कार्यकर्ता ,,,शेर छाप मसाला से लेकर ब्लंडर प्राइड तक बटे हुए,,,बोटी नोंच रहे,,ढोलधोल रसा चुहुक रहे,,,टिंगू दाऊ लगी लाग में कह उट्ठे,, ममा एक बार तो बर के देखा दे गा,,,,बिंझवार एक सांस में पैग गटक गया,,,तंहु भाँचा बड़ ठिठोली करथस,,,,ये बारी तो बस्ती में आबादी पट्टा देलवा देबे,,,,भाँचा मुस्कुराते हुए नया पैग बना रहा है
इस बार गाँव भर में डायरिया फैला है,,बी एम ओ साहेब की रिपोर्ट है,,,सूखते तालाब की दूषित मछली खाई है ,,,हर घर लोग खटिया पकड़ रहे,,, जब छह सात लोग निपट लिये,,,तब दवा दारू से विश्वास क्यों न डगमगाये,,,पंचायत बैठकी जरूरी है,,,,फागु बैगा की गुप्त रिपोर्ट,,अभी छत्तीस घर और काठी उठेगी,,,सरपंच जी,,,इलाज जरूरी है बिंझवार मिर्धा को रात गए शीतला चौरा के पास छकत दारू पिलाई गई,,,,,टिंगू दाऊ फिर कहे,, ममा अब तैं बर जा,,,,,,भरे चौरा में बिंझवार मिर्धा भभक रहा है,,,,माटी तेल के फैलते धूंगीया में भुनता मानव मांस ,,भीड़ घेर कर चीख सुनती है ,,,देखती है रकसा कैसे बरता है,,,,भक्क भक्क
बरना^ जलना
अनुभव
Sunday, September 18, 2022
उम्दा जायका,,,उसके इन्द्रिडेंट से नही बनाता,,वो तो बनता है जज़बातों की भीगी महक और परम्पराओं की गाढ़ी चाशनी से,,तो जनाब,,,निरामिष भोजन की श्रृंखला में,,हमने किसम किसम के जायके ,,चखे पर ,,छतीसगढ की लाल माटी ,,जो टेस्ट बर्ड्स को गुदगुदाती है वो रेशेपी ,,मैंने पहले पहल चखी ,,रुदनी ,,संग अमठही,,संग भाँटा,,ये जायका खालिस देशी है और इससे सरोकार है,, हमारे आशीष भाई का,, वो इस शिद्दत से ये जायका चुरोते है कि महरबा,,ग़ालिब घूम आते है,,,
हजारों ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिस पे दम निकले
तेरे रुदुवा में जो चटखारे है वो हर जायके से कम निकले
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन
बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले
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