Tuesday, September 8, 2020

महफ़िल मेरे पाटन की रह रह के महक रही
कोविड तेरी वजह से बेजार हो गया हूं
अब तो विदाई लेले फेफड़ो से मेरे
अपनो से जाम  टकराने बेकरार हो गया हूं

Thursday, August 20, 2020

हे गौरी ,,जल झन पीना
भोले भंडारी बोले
नंदी महराज कंबिन्स हुए
ओकरो मुडी डोले
माता गौरी गुर्री गुर्री देखत तेकर बाद
लुगरा सांटी लाबे आजे,,तभ्भे रँहु उपास

हरितालिका तीज की बधाई

Monday, August 17, 2020

pora

पोरा तिहार के सजे बाज़ार से माटी के बैल जोडे और चुकिया बिसा लाये,,,,,इन मृण्मूर्तियों से आज सभ्यता की कहानी शुरू हुई ,,,कहानी उस दौर की है जब जंगल की एक घांस को हमने खेतों में उगाना सीखा,, बैलों के संग हल से खेत जोत कर पहले पहल ,,माटी के भीतर से सभ्यता की कथा शुरू हुई,,,त त त त,,,राजस्थान के कालीबंगा में हल से जुते खेत के  साक्छ यू तो 5000 वर्ष पुराने है,,पर लोहे के फाल वाले हलों ने बुद्ध के दौर में नगरीय क्रांति ही खड़ी कर दी,,,चमचमाती कारों के दौर से पहले इन्ही बैल गाड़ियों से राहें गुलजार रहती थी,,जिसकी बानगी राजकपूर की रेणु कथा पे आधारित फ़िल्म तीसरी कसम में देखिए,,इस कर के,,प्रेमचन्द ने अपनी कथा में हीरा मोती बैलों को नायक चुना,,,जो बैलो का साथ न होता ,,तो क्या होता,,
                  आज इतिहास का कालक्रम मृदभांडों पे आधारित है,, हर सभ्यता की पहचान उस दौर के विशेष मृदभांडों से होती है,,काले लाल ,,सैन्धव सभ्यता,, उत्तरीय ब्लेक एन्ड पॉलिश्ड पोटरी बुद्ध के काल के ,,लाल कुषाण कालीन मृदभांड,,,इस कुम्हार कला का ही सम्मान है पोरा तिहार,,,चुकिया,,चक्की की पूजा,,इन खिलौनों के साथ हमारी ग्रामीण संस्कार बचपन को दिक्छित करते है,,,,, इस त्योहार का जायका भी जुदा है ,,,कुर मुरी ठेठरी और खस खसी ,,खुर्मी ,,,,देशी सुवाद से लबरेज,, कूट रूंग कूट रूंग खाइये,,,,,हमारी किसानी तहज़ीब के इस तिहार पोरा की सभी को हार्दिक बधाईया,,

अनुभव

Monday, August 10, 2020

कोबिड

कहत कोबिड रे! मनखे जात
जम्मो दुनिया तन्हि कमात
आनी बानी के जीव औ प्रान
काबर जनमिस होही भगवान
बाढ़ गे तोर अस अत्याचार
तेकर सेती ले हव अवतार
थोथना ढाँके ले नई मिले परसाद
बेक्सिन खोज ले मनु के औलाद

Thursday, August 6, 2020

नाना जी

हमारे नाना जी कमाल के जादूगर भी थे,,उनके कई तमाशो के चश्मदीद हमारा छुटपन रहा,,,,सुबह बरामदे की तखत में उनकी बैठक जमती,,सामने की खिड़की से सूरज की रौशनी ग्रिल से छनती हुई दीवार पे बिखरती होती जिसमे तैरते गोला बीड़ी के धुंवे के छल्ले के बीच एक जादुई मंच बना जाता,,बिखरे सेविंग किट,,के बीच सिह सिह करती नानी के हाथों चीनी मिट्टी के कप में जब तीसरी चाय सुडुक जाती तब कंही वो खेला प्रारम्भ होता,,,उस दौर में बच्चों के लिए,,,रंग बिरंगी बाँटिया बहुमूल्य निधि होती थी,,,नाना जी पहले दोनों हाथों को मसलते,, फिर हमें दिखाते,,,खाली है ,,दर्शकों की सहमती,,, खाली है,,,अब देखो,,,ध्यान से ,,,,और मन्त्र उच्चारण जिसे हम कभी समझ न पाए,,,फिर दन्त हीन मुख से बाँटिया एक एक कर बरसने लगती,, बाटियों की ताबड़ तोड़ बारिश,, सबके हिस्से जादुई बाँटिया बट जाती,,,बजाओ ताली,,तड़ तड़ तड़,,,काफी बाद में जाकर पता लगा,,की पृष्ठभूमि में खड़ी छोटी मौसी इस जादुई खेल में उनकी सहायिका थी,,बांटी पीछे मुड़े हाथों तक पहुचाने में,,,एक शरारत भरा खेल भूत दिखाने का भी होता,,जिसके चपेडे में कोई एक बार ही आता,,, वो देखो भूत ,,कंहा ,,,बच्चा ऊपर खोजता,,,वो दे रे बुजा के,,,कंहा,,और फिर सुलगती बीड़ी चुट से पैर में जलती,,,बाल क्रंदन की ध्वनि से पूरा माहौल गूंज उठता,,,और नाना जी की हंसी,,,उहि तो है रे,,,खिन्नन्नंन्नं भरी नाना जी की हंसी जीभ निकाल कर खांसते हुए ही समाप्त होती,,,,,,ऐसे कई जादुई खेल रोज की दिनचर्या में शामिल थे,,,पर ये ऐसा खेल था जिसका टिकिट का पैसा भी आखिरकार हमे ही मिलता,,,गोल चवन्नी,,वो भी उनके कान से निकली हुई,,,,,,,,बाल मनोविज्ञान के सभी प्रयोग उस दौर में हम पर हुए,,,आज वो स्मृतियां ही किसी जादुई लोक की लगती है

Thursday, July 23, 2020

लॉक डाउन के दौर में,,,,स्मृतियां,, वन्य वैभव की

क्या गजब घाटी है साल वेली ,, अमरकंटक पर्वत को घेरे सतपुड़ा के ऊंघते अनमने जंगल के बीच से फुर्ती के साथ किसी सर्प सी उतरती है,,,,,,मानसूनी बादल किसी कटी पतंग से हरियाते साल वृक्ष की डालियो में फस कर फड़फड़ाते है,,गरजते फिर बरस पड़ते है,,,और पूरी घाटी जल धाराओं की कल कल से गूंजने लगती है,,,,,इसी प्राकृतिक एपोरा के बीच आदिम बैगाओं ने अपनी खेतों की छोटी डोलियां,, और कच्ची भूरी खपरैल की छत तान ली है ,,,,जिनसे लग कर ,,,एक रिजॉर्ट भी इस पूरे सांस्क्रतिक कलेवर को समेटे आपका इंतजार करता है,,,,साल वेली रिसोर्ट,,, 
               शहर केवल प्रश्न देंते है तनाव से भरे थकान से चूर मष्तिष्क को बहुत सहज जवाबो की तलाश बनी रहती है,,किसी सुबह जब आप इस रिजॉर्ट के आंगन में पसरे आम्र कुंज के नीचे बैठ ले ,,तो पपीहे की पीहू पीहू और कोयल की कुहू कुहू,, मन मे सिमटे बोधिसत्व को जाग्रत क्यू न करे,,,, नमी में भीगी घांस हरियाती ही जा रही है,,,चारो ओर ,,,काई लगी सीढियो से सम्भल कर उतरते देखा नीचे लगे हुए खेत मे दो बैल जूते हुए है ,,त त त त ,,,,की बोली समझते ,,,हवा नर्म ओर कई वन रेजीनो की सुंगन्धो से भरी धीमे धीमे,,,बस बह रही है,,,मधुमक्खीयां ,,तितलियों संग फूलों के चयन में लगी है,,,,वहाँ जंहा डूमर को वन बेल ने ऐंठ कर कोई कलाकृति बना दी है ठीक उसके नीचे,,कनखुजुरा टहल रहा है,,,फिर बड़ी फीकी मुस्कान लिए एक दुपहरी सजने लगती है,,,गुनगुनी ,,,टूक टूक टूक की ये आवज जो कंही दूर से आरही है ना ,,वो कॉपर स्मिथ बारबेट की कलाकारी है,,,जनाब,,, ये वक्त है,,,जायके का,,तो फिर रेस्त्रां की रसोई से गहरी लहसुनी प्याज की गंध क्यू नही उड़ रही,,,ये महक है उस छौंक की जो किसी मसाले भरे पंजाबी ढाबे से जुदा,,, देशी व्यंजन परोसता है,,,कुरकुरे कोहड़ा फूल के भजिये हो या फिर,,,खट्टी कढ़ी के साथ खेक्सी आलू और आम अथान की कलियों,,, उदर भरकर आराम और कुर्सी में पसर गए,,,
                     आखिरकार शाम उतरने लगी ,,ओर चारो ओर कीट पतंगे,,भिनभिनाने लगते है,,कंही कोई तारा बादलों के बीच दिख गया तो लगता है अभी टपक जाएगा, ,,,,,ये थोड़ा सा वक्त ही आपको वो सामर्थ्य देगा,,जिससे जिंदगी फिर नई नई लगने लगे

Wednesday, July 8, 2020

अब तुम बड़ी हो रही हो ,,कुहू
उस रोज तो बिल्कुल छोटी थी
तब भी यूँही रिसते थे बादल
तुम कठिन छंद में रोती थी
तब से मैं पापा हु