फेर फरही महुआ.....
फागुन लगे में महुहारी जाड ....टप्प टप्प गिरता है महुआ झाड़ से फल ..बिहिनिया बिहिनिया.. .चक पिउंरा..अउ रसा भरे गुल्ला...चलो रे...पूरा गाव जंगल में सकला गया...टोकनी थैला लिए...दूर तक फैली मदमस्त सुगंध...
सूंघता हुआ लम्बी थूथन वाला काला भालू भी उतरता है पहाड़ी से मचकते मचकते....आखिर उसका भी हिस्सा है इस खजाने में..तो जन्हा हिस्सेदारी है वंहा झगरा लड़ाई भी..पर साल सोखवा को महुआ झाड़ पास भलुवा भेटा गया...सोखवा का तेंदू लौठी नींग दिया .. भागा सोखुवा फेर भलुवा को पायेगा .. दुनो पैर बिच टांग चेप भकरस ले मुड़ भसरा गिरा दिया .. जो ककोमाँ ..ता सारा ..पूरा चुंदी मुड़ी झूल गे....लहूलुहान...आज भी घाव ले लहू बोहाता है...फेर वाह रे महुआ .... पहिला कुनकुना धार मारो ..दरद पीरा सब फुर्र्र..
गावं भर में जियादा सेन्तु बैगा बिनता है महुआ ..काहे ... बघवा के परसादी ले.. जंहा गावं वाला घुसा जंगल भीतरी वन्ही ...झारी के पाछू दहाड़ा बघवा..भागो रे ..बड़े जान बघवा ..कोन देखिस रे..रेचका हर ..आवाजे भर सुने हों फेर पोटा कांप गे ददा....ये हर बस ककोमे नही.. टोटा ल धर के खिंच दिही ...पूरा गावं भीतरिया गया...खार में बघवा आ गे हे.....फेर सेन्तु बैगा के अंगना में टोकना टोकना महुआ...गावं वाले जानते है...सेन्तु बघवा ल ऐसन फूक मारथे के बघवा डिगे नहीं बांध देथे ...जतका बिनना है बिन .पूरा गावं वाला बैगा से गोहार लगईस...तब जा के डोंगरी खार को बांधा सेन्तु बैगा....मजाल फेर बघवा के जो आये...बिनो रे खतरा टल गे हे..
त्रिलोचन गुप्ता के किराना दूकान में मार महुआ गोंजाय हे ..बोरा बोरा ..सुखा महुआ पांच रूपया किलो..ताजा तीन रूपया...सेन्तु के अंगना जैसे दस अंगना भर सूखता हुआ महुआ...पूरा गावं भर का कर्जा उधारी छोटाता है ईही टाइम..सोखवा पर साल इलाज पानी के लिए दस हजार कर्जा लिया ब्याज किये अठारह हुआ...गुप्ता सेठ गुसिया गया है... ये दारी का पैसा टप्प टप्प उठा रहा है ..पुराना कोंन चुकाएगा रे..भालुवा बघवा से डर्रायेगा तो कैसे छुटेगा करजा...सोखवा अपने घाव पे हाथ फेरते बोला...छोंट दूंगा...सोखवा सोचता है...भालुवा बघवा का घाव तो भरा भी जाए..सेठ का करजा कैसे भारयेगा....फेर फर जा रे महुआ
अनुभव
Saturday, April 5, 2014
फेर फर जा रे महुआ
Monday, March 10, 2014
बाप की जमींन
बाप की जमींन (महिला दिवस को समर्पित)
भूखिन बाई के पोपले मुह में दो दांत ही थे कील की तरह होंठो के बीच से उभरे हुए..अपनी सूखती जीभ को वो बार बार लार से लपेट लेती थी चप चप ..मकड़ी के जाले सी लकीरों से भरा चेहरा... लकीरे एक शिरोरेखा सी...जिस पे कुछ लिखा हो ..और मिट गया हो
कांसू पर्रा ल भीतरिया दे ..चप चप...फेर झरी परही ..झप्पर से रिझता पानी ...बेमौसम...चना में कीरा परही कांसू ...ये मौसम में भजिया खात रिहिस मोर बाप ...भूखिन इकलौती थी छोटी सी अपने बाप की उंगली पकड़ जब खेत जाती ..देख तोरे जमींन हे बेटी...फूल जाती थी भूखिन..मोर बाप के जमींन मोर जमींन..ब्याह के बाद जमींन के साथ ही उसकी विदाई हुई ससुराल को
भूखिन का घरवाला चना बोता था ...पांच एकड में हरियाते चने के छोटे छोटे पौधे.... रोज अपनी सास को याद दिलाती थी भूखिन .मोरे बाप के जमींन ले बोजत हो .सास के ताने का जवाब ..बाझिन रोगहि लईका नै दे सकस तो छोड़ दे मोर टूरा ल.. दिन भर की चकचक का.हिसाब रात को पति लेता था.. फेर एक दिन भूखिन ने ही चूड़ी बदल ली ...अब उस जमीन में कांसू का बाप सब्जी भाजी उगाने लगा ..बेटा हुआ गए में हुई कांसू...बाप के बाद अब बेटा कमाता है...बहु आई सो फिर पुरानी कहानी आघे बढ़ी ...डोकरी मरे नहीं ..डोमी कस बैठ गे हे..भुखिन्न का वही पुराना अजमाया जुमला ..एकर नै मोर बाप के जमींन हे ..तेकर बल में तिरर्तिरात हस अतका.. ..तै टार अपन मुहु ल हम नै मरन..अपन बेटी ल दे देबो जा.. माँ के मीठे दुध का सुवाद भुला जाता है कड़वे बोल ने बेटे को जरजरा दिया..डोकरी तोर बाप के हे तो का कब्ज़ा तो मोरे हे ..फेर आज नहीं तो काल मरबे..के ले के जाबे साथ में.
..तहसील में कासु का हाथ धरे गयी भुखिंन ..मोतियाबिंद भरी आंखे झरने लगी..तै पूरा जमीन ल मोर बेटी के नाम कर दे साहेब....भगवान टुरी जात के किसमत में लात ही लिखे हे ठीक हेबफेर बोल तो पाही मोर माँ के जमीन ..अतका भरोसा में ही काट लेही...कासू पर्रा भितरा रही है... कासु पटवारी आईस क..कब्ज़ा दिलवाए बर...खटिया में बैठ कर भूखिन बडबडा रही है ...मोर बाप के जमीन
अनुभव
Sunday, March 2, 2014
मुंडू ठेठवार का परेत
मुंडू ठेठवार का परेत
मुंडू ठेठवार पर चार हजार की उधारी थी बट्टू गोउठिया रोज पेराहि देते थे..मुंडू ने सिलयारी भट्टी में दो बोतल मसाला ठर्रा चढ़ाया..रात दस ग्यारह बजे रहे होंगे अगार खार के तरिया उपर वाले अमली पेड़ के नीचे टुनकी में लेट लिया ...फेर सुबह दुकलहा लोटा लिए जा रहा था ..देखता क्या है मुंडू का आंखी कान तिरिया गया है मुहु से फ़ेना मारा है...मुंडू निपट लिया..करजा बाड़ी के साथ...वो दिन है और आज.. अमली झाड़ के आस पास जो भी गए रात फटका ..मुंडू ठेठवार का परेत उसको धरता च है ...सोखवा ऊपर दल्लू साहू का दो गाडा धान अधिया का वसूली बाकी था...सायकिल टेरते आता रहा की भसरंग से मुंडु केरियर में कूदा ...और चपक दिया दुनो हाथ से...साँस लटक गयी ..छाती फूल गयी...अगले दिन से सोकवा आंखी तरेरे सारे गाव गली झूमता रहता.. दल्लू साहू को बखानता..तोर.. दल्लू नै छोड़व रे..मै हो रे मुंडू ..तोर ...दल्लू ...कोइ पास फटका की चप्प ले धरा...बैगा के पास दस आदमी ठोंस के ले गए...मिरचा का धुन्गिया मार ...नीम का सांटी से जो सोंटा जो पीठ में लाल रोला उपक गया..फेर मुंडू है की जाए नहीं...तोर दल्लू ...दो मुर्गा कांट ..दो बोतल मसाला चघा..फेर मुंडू नै डिगा..आखिर बैगा बोला दल्लू को बुलावो...देख रे दल्लू ये मुंडू का परेत है ..उधारी पानी छोड़े बिना नै जायेगा...छोड़ नै तो अभी बखानता है कल को एकात बार अकेले में चेप दिया तो तेरा टोटा च मसकेगा....दल्लू पसीना पसीना..बोला छोड़ दे रे सोकवा को मुंडू...उधारी छोड़ रहा हु..लबारी मारू तो मेरे को लोकवा मारे...अचानक सोकवा जोर जोर से हिल्लोरा मारा ..मुहु से दे फेना..और एक तरफ लुढ़क गया..मुंडू परेत उतर गिया..तीन दिन गए सोकवा एकदम ठीक ..फिर दल्लू घूर के देखे जरुर पर कभी उधारी का जिकर नै किया...तब से गाव में कोई उधारी नै देता....साला सभी कर्जा दार को मुंडू ठेठवार धर देता है..बोल के भी मांगे तो भी नै देना..नै धरेगा दाऊ मेरेको नै धरेगा..लौटा दूंगा ..दे दे पर कौन भरोसा भुत परेत का ..स्टाम्प लिखा पढ़ी सब फेल..गाव वाला कापरेटिव बैंक मनेजर बदली का अरजी दिया है..रिपोट में लिखा गाव में मुडू परेत है सो लोन नै बाट सकते
अनुभव
Thursday, March 7, 2013
छुटपन की एक घटना मुझे आज भी भीगा देती है ,,उन दिनों हम लोग गर्मी की छुट्टियों में जांजगीर गए हुए थे ,,,मै जिन रिश्तेदार के घर था ,,उन्होंने बताया की वंहा के एक पारिवारिक मित्र ,,की माता मेरे गाँव कुकेरा से थी ,,,और वो हमसे मिलना चाहती हैं ,,अपनी माँ के साथ एक शाम ,,जब हम उनके घर पहुचे ,,तो हमारा परिचय कुकेरहींन दाई से हुआ ,,,आधी झुकी हुई बुजुर्ग महिला हमसे ऐसे मिली ,,जैसे कोई विदेश में अपने देश के लोगों से मिल रहा हो ,,वो ललक कर हमारे गालो को छूती ,,,और फिर गाँव के एक एक परिवार से अपना रिश्ता स्पष्ट करती,,सत्तर की उम्र की याददाश्त भी मानो फिर युवा हो गयी थी ,,फलाना मंदिर ,,फलाना कका,,,तालाब,,आम जामुन ,,उस एक घंटे में उन्होंने सब कुछ समेट दिया ,,,लम्बे समय से हमारे गावं की उस बेटी ने अपना पैत्रिक घर नहीं देखा था ,,,और शायद फिर देख भी न पाई हों ,,,,लेकिन जांजगीर में बसे अपने बड़े परिवार में घुली मिली उस बहु की बूढी आँखों में आज भी ,,कुकेरा से विदा हुई एक १४ साल की बेटी छुपी हुई थी ,,जो अपने गावं के बच्चो से मिलकर उन् पर वोह आत्मीयता बरसा रही थी ,,जिससे खुद उनके बच्चे कुछ अपरिचित लग रहे थे ,,,हमर गौरहा परिवार के लईका ,,, जाते वक्त उनकी आँखों में मैंने आंशु देखे मानो ,, दुल्हन अपने मायके से विदा हो रही हो ,,, आज उस मुलाकात को याद कर ,,महसूस होता है की अपने पित्र प्रधान सामाजिक ढांचे में हम भले ही अपने परिवार की विदा की बेटियों को उस शिद्दद से याद नहीं रखते ,,,पर वो बेटिया अपने परिवार में पूरी तरह डूब कर भी ,,,अपने भीतर अपने छोड़े हुए परिवार के प्यार को हमसे ज्यादा सहेजे रखती है ,,,जिसकी बारिश में उस दिन हम भीग गए ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Tuesday, July 3, 2012
गिरफतार लश्कर आतंकवादी अबू जुन्दाल की माँ का कहना है " मेरा बेटा बेकसूर है , उसे क्यों पकड़ा गया??मुबई हमले में मारे गए लोगो की माओं का भी लगभग यही कहना है ,,हमारे बच्चे निर्दोष थे ,,उनके साथ ऐसा क्यों हुआ ,,,अंतर है तो इतना की अबू की माँ का बेकसूर बच्चा आज भी जिन्दा है ,,,और २६ /११ में मारे गए लोगो की माओ की गोद हमेशा के लिए सुनी हो चुकी है ,,,,,,अबू की माँ जानती है ,,की भारतीय न्याय व्यवस्था में उसके बेटे का गुनाह जल्द साबित नहीं हो सकता ,,गर हो भी गया तो सजा मिलना आसान नहीं होगा ,,अगर सजा भी हो गयी ,,तो भी उसके जिगर का टुकड़ा ,,सलाखों के भीतर ही सही ,,सांसे तो लेता ही रहेगा,,साथ ही एक माँ की मार्मिक अपील ,,दिग्विजय जी जैसे कोमल ह्रदय राजनयिक को उनके घर तक आने को मजबूर भी कर सकती है ,,,रही मुंबई में मारे गए लोगो की माओं की बात ,,तो उनके आंशु से इस लोकतंत्र की बंजर होती जमी में उगे केक्टस सीचे जायेंगे ,,जिससे उनका और हमारा हृदय सदेव बिधता रहेगा ,,,,,,,,,
अनुभव
आदमी की पहचान आज कल उस गाड़ी से जानी जाती है ,,वह जिसमे घूम रहा है ,,,सफारी ,,स्कार्पिओ या पजेरो जैसी एस यु वी में घूमने वाले भले ही रायपुर की ट्रेफिक के लिए सिरदर्द हो ,,लेकिन उनके भरी भरकम राजनितिक व्यक्तित्व का बोझ ऐसी ही बड़ी गाड़ी ढो सकती है ,,मर्सडीज ,बी ऍम डब्लू या ओडी जैसी लम्बी गाडियों में घूमने वाले अपने व्यापारिक व्यस्तता की थकान ,,और अपनी फैलती दुकान,, का भार इन विदेशी कम्पनियों के हवाले कर सुखी होते है ,,,, सेंट्रो ,,मारुती में घुमते माध्यम वर्गी तो ,,अपनी गाड़ी के पे लगे एक स्क्रेच को याद कर सपने में भी कराह उठते है ,,,बचे पुरानी फिअट वाले तो उनकी औकात यह है की उन्हें रिक्शावाले भी साइड देना पसंद नहीं करते ,,,,अगर वाहनों के महत्व की तुलना पौराणिक हिन्दू देवताओ से करे तो कुछ ऐसी ही तस्वीर दिखाई पड़ती है ,,,,,,,,,
देवताओ में सबसे भारी एवं गज शीशधारी गणेश जी का वाहन चूहे को चुना गया ,,,यह तो अद्भुत व्यंग है ,,,वन्ही धन और समृधि की देवी श्री लक्ष्मी के स्वामी विष्णु भगवान का वाहन गरुड़ गति और पिक अप में तो बेहतर है लेकिन स्टाइल और डिज़ाइन में नारायण के स्टेटस का नहीं लगता ,,और माइलेज के हिसाब से मुर्दाखोर होने के कारण थोडा मिडिल क्लास लगता है ,,,इस मामले में भगवान शिव का वाहन नंदी जरुर लेण्ड क्रुसर वाला एस यु वी प्रभाव रखता है ,,जो उनके निवास स्थान पहाड़ो के लिए उपयुक्त भी,,इन्द्र का वाहन हाथी भी उनकी राजा वाली हैसियत के अनुरूप जरुर है लेकिन संसार के सभी तपो को भंग करने वाले उनके काम के लायक गति की अपेक्षा इससे नहीं की जा सकती ,,,,,जो भी हो देवताओ के लिए चुने गए वाहनों में तो और भी अधिक विरोधाभास दिखाई पड़ता है ,,,,खैर जो भी हो यह तो तय है ,,की वाहन का चयन ,आजकल ,काम की जगह पहचान से ज्यादा प्रभावित होता है ,,,,तभी तो २१ वी सदी में भारत के नेताओ ने भी अपनी ग्लोबल पहचान दिखाने के लिए अम्बेसडर को छोड़ कर महगी कारो के काफिले को चुना है ,,आखिर वही तो बढ़ते भारत की पहचान है
अनुभव