Wednesday, September 9, 2026

पोरा

  • जाता-चुकी’ की कथा  के अनुसार, राजा की बेटी जब मायके से विदा होने लगी, तो उसने अपनी बचपन की सहेली (कुम्हार की बेटी) से माटी के बर्तन माँगे ताकि वह पराए घर जाकर भी अपने मायके के स्वाद और संस्कृति को न भूले। तभी से पोरा पर कुम्हार द्वारा छोटी बच्चियों के लिए 'जाता-चुकी' गढ़ने का विधान बना।

​छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति में ‘पोरा’ (पोला) केवल एक त्यौहार मात्र नहीं है, बल्कि यह इस अंचल की कृषि-व्यवस्था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुधन के प्रति कृतज्ञता और श्रम-संस्कृति का सबसे जीवंत दस्तावेज है। भाद्रपद (भादो) मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों में भी पूरी आस्था, उल्लास और पारम्परिक भव्यता के साथ 'पोला' (Pola Festival) के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व भारत के इस मध्य क्षेत्र की उस मूल आत्मा को अभिव्यक्त करता है, जो माटी से जुड़ी है और जिसके केंद्र में हल चलाने वाला किसान, खेतों की कीचड़ में डटे रहने वाले मवेशी और श्रम का सम्मान है।

​१. पोला/पोरा का शाब्दिक और सांस्कृतिक फलक

​छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र दोनों ही राज्यों में पोला मुख्य रूप से पुरुषों और पशुधन के श्रम के उत्सव के रूप में जाना जाता है। लोक-विश्वास के अनुसार, पोला अमावस्या की वह पवित्र रात्रि होती है जब खेतों में लहलहाती धान और अन्य फसलों की बालियों में दूध भरना शुरू होता है (अन्न माता गर्भ धारण करती हैं)। इस परिवर्तन के स्वागत और कृषि-चक्र की निरंतरता के लिए प्रकृति का आभार जताने का यह विशिष्ट अवसर है। छत्तीसगढ़ में इसके ठीक दो दिन बाद आने वाले 'तीजा' (हरतालिका तीज) के साथ मिलकर यह पर्व मायके आने वाली बेटियों, पारिवारिक स्नेह और स्त्री-शक्ति के समूचे विधान को पूरा करता है, जबकि महाराष्ट्र में यह खेती के मौसम के बीच मवेशियों को समर्पित सबसे बड़ा कृषि-पर्व होता है।

​२. कुम्हार की चाक और माटी के नंदी (नंदी बैल)

​पोरा/पोला की परिकल्पना बिना कुम्हार (प्रजापति) समाज के शून्य है। त्यौहार के हफ़्तों पहले से कुम्हार अपने चाक पर माटी के नंदी (पोरा-बैल) और छत्तीसगढ़ में छोटी बालिकाओं के लिए 'चुकी-जाता' (रसोई के खिलौने और चक्की) गढ़ने में जुट जाते हैं।

  • ​पोला/पोरा के दिन घरों में इन मिट्टी के बैलों की स्थापना कर हल्दी, सिंदूर, दूब और फूलों से उनका श्रृंगार किया जाता है।
  • ​महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ दोनों ही जगहों पर बच्चे इन मिट्टी या लकड़ी के पहिए वाले बैलों को धागे से बांधकर गलियों में दौड़ाते हैं, जो इस पर्व का सबसे प्रमुख बाल-आकर्षण होता है।

​३. गोवंश की महिमा: कोसली-देशी बैल और श्रम का सम्मान

​छत्तीसगढ़ और विदर्भ (महाराष्ट्र) की कृषि मुख्य रूप से यहाँ की स्थानीय और प्रामाणिक गोवंश प्रजातियों पर टिकी रही है।

  • जैबू (Bos indicus) परिवार से ताल्लुक रखने वाले ये देशी बैल अपने मजबूत कुबड़ और द्विभाजित (Split) खुरों के कारण खेतों में जुताई और गाड़ी खींचने के लिए प्रकृति द्वारा प्रदत्त वरदान साबित होते हैं।
  • ​पोला के दिन इन मवेशियों को खेतों के कठिन श्रम से पूरी तरह मुक्ति दी जाती है। उनके सींगों की मालिश कर, उन्हें रंग-बिरंगे झूलों, कौड़ियों और घुंघरुओं से सजाकर तथा विशेष कलेवा व पूरनपोळी/ठेठरी-खुरमी का भोग लगाकर ग्रामीण समाज यह संदेश देता है कि मवेशी केवल संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार के सहयात्री हैं।

​४. लोक-व्यंजनों और सांस्कृतिक अनुष्ठान

  • महाराष्ट्र का पारंपरिक पकवान: महाराष्ट्र में पोला के अवसर पर घरों में विशेष रूप से पुरनपोळी (Puran Poli), मोदक, करंजी और आरसा जैसे पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें बैल की पूजा के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
  • छत्तीसगढ़ का पारंपरिक कलेवा: छत्तीसगढ़ में इस दिन 'ठेठरी' (संस्कृत के 'कल्यवर्त' यानी प्रातःकालीन कलेवा से विकसित), खुरमी और चौतेला बनाए जाते हैं, जो तीजा के समय बेटियों के साथ ससुराल भेजी जाने वाली 'दहरी' (कलेवा) का भी मुख्य हिस्सा बनते हैं।
  • ​इसके साथ ही, छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक मंदिरों (जैसे भोरमदेव, राजीव लोचन) और महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों के पाटिल-पंचों की देखरेख में गोठान पर होने वाले सामूहिक गो-पूजन यह प्रमाणित करते हैं कि पोला/पोरा लोक-संस्कृति और सामुदायिक समरसता का सबसे बड़ा पर्व है।

​निष्कर्ष

​आधुनिकता और मशीनीकरण के इस दौर में जहाँ खेती के तौर-तरीके बदले हैं, वहीं पोला/पोरा आज भी छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के जन-मानस को उसकी जड़ों से जोड़े रखने का सबसे बड़ा सेतु है। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि माटी का सम्मान, पशुधन के प्रति करुणा और श्रम का उत्सव ही किसी भी समृद्ध समाज की सच्ची नींव होते हैं।

​छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति में ‘पोरा’ (पोला) केवल एक त्यौहार मात्र नहीं है, बल्कि यह इस अंचल की कृषि-व्यवस्था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुधन के प्रति कृतज्ञता और श्रम-संस्कृति का सबसे जीवंत दस्तावेज है। भाद्रपद (भादो) मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों में भी पूरी आस्था, उल्लास और पारम्परिक भव्यता के साथ 'पोला' (Pola Festival) के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व भारत के इस मध्य क्षेत्र की उस मूल आत्मा को अभिव्यक्त करता है, जो माटी से जुड़ी है और जिसके केंद्र में हल चलाने वाला किसान, खेतों की कीचड़ में डटे रहने वाले मवेशी और श्रम का सम्मान है।

​१. पोला/पोरा का शाब्दिक और सांस्कृतिक फलक

​छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र दोनों ही राज्यों में पोला मुख्य रूप से पुरुषों और पशुधन के श्रम के उत्सव के रूप में जाना जाता है। लोक-विश्वास के अनुसार, पोला अमावस्या की वह पवित्र रात्रि होती है जब खेतों में लहलहाती धान और अन्य फसलों की बालियों में दूध भरना शुरू होता है (अन्न माता गर्भ धारण करती हैं)। इस परिवर्तन के स्वागत और कृषि-चक्र की निरंतरता के लिए प्रकृति का आभार जताने का यह विशिष्ट अवसर है। छत्तीसगढ़ में इसके ठीक दो दिन बाद आने वाले 'तीजा' (हरतालिका तीज) के साथ मिलकर यह पर्व मायके आने वाली बेटियों, पारिवारिक स्नेह और स्त्री-शक्ति के समूचे विधान को पूरा करता है, जबकि महाराष्ट्र में यह खेती के मौसम के बीच मवेशियों को समर्पित सबसे बड़ा कृषि-पर्व होता है।

​२. कुम्हार की चाक और माटी के नंदी (नंदी बैल)

​पोरा/पोला की परिकल्पना बिना कुम्हार (प्रजापति) समाज के शून्य है। त्यौहार के हफ़्तों पहले से कुम्हार अपने चाक पर माटी के नंदी (पोरा-बैल) और छत्तीसगढ़ में छोटी बालिकाओं के लिए 'चुकी-जाता' (रसोई के खिलौने और चक्की) गढ़ने में जुट जाते हैं।

  • ​पोला/पोरा के दिन घरों में इन मिट्टी के बैलों की स्थापना कर हल्दी, सिंदूर, दूब और फूलों से उनका श्रृंगार किया जाता है।
  • ​महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ दोनों ही जगहों पर बच्चे इन मिट्टी या लकड़ी के पहिए वाले बैलों को धागे से बांधकर गलियों में दौड़ाते हैं, जो इस पर्व का सबसे प्रमुख बाल-आकर्षण होता है।

​३. गोवंश की महिमा: कोसली-देशी बैल और श्रम का सम्मान

​छत्तीसगढ़ और विदर्भ (महाराष्ट्र) की कृषि मुख्य रूप से यहाँ की स्थानीय और प्रामाणिक गोवंश प्रजातियों पर टिकी रही है।

  • जैबू (Bos indicus) परिवार से ताल्लुक रखने वाले ये देशी बैल अपने मजबूत कुबड़ और द्विभाजित (Split) खुरों के कारण खेतों में जुताई और गाड़ी खींचने के लिए प्रकृति द्वारा प्रदत्त वरदान साबित होते हैं।
  • ​पोला के दिन इन मवेशियों को खेतों के कठिन श्रम से पूरी तरह मुक्ति दी जाती है। उनके सींगों की मालिश कर, उन्हें रंग-बिरंगे झूलों, कौड़ियों और घुंघरुओं से सजाकर तथा विशेष कलेवा व पूरनपोळी/ठेठरी-खुरमी का भोग लगाकर ग्रामीण समाज यह संदेश देता है कि मवेशी केवल संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार के सहयात्री हैं।

​४. लोक-व्यंजनों और सांस्कृतिक अनुष्ठान

  • महाराष्ट्र का पारंपरिक पकवान: महाराष्ट्र में पोला के अवसर पर घरों में विशेष रूप से पुरनपोळी (Puran Poli), मोदक, करंजी और आरसा जैसे पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें बैल की पूजा के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
  • छत्तीसगढ़ का पारंपरिक कलेवा: छत्तीसगढ़ में इस दिन 'ठेठरी' (संस्कृत के 'कल्यवर्त' यानी प्रातःकालीन कलेवा से विकसित), खुरमी और चौतेला बनाए जाते हैं, जो तीजा के समय बेटियों के साथ ससुराल भेजी जाने वाली 'दहरी' (कलेवा) का भी मुख्य हिस्सा बनते हैं।
  • ​इसके साथ ही, छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक मंदिरों (जैसे भोरमदेव, राजीव लोचन) और महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों के पाटिल-पंचों की देखरेख में गोठान पर होने वाले सामूहिक गो-पूजन यह प्रमाणित करते हैं कि पोला/पोरा लोक-संस्कृति और सामुदायिक समरसता का सबसे बड़ा पर्व है।

​निष्कर्ष

​आधुनिकता और मशीनीकरण के इस दौर में जहाँ खेती के तौर-तरीके बदले हैं, वहीं पोला/पोरा आज भी छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के जन-मानस को उसकी जड़ों से जोड़े रखने का सबसे बड़ा सेतु है। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि माटी का सम्मान, पशुधन के प्रति करुणा और श्रम का उत्सव ही किसी भी समृद्ध समाज की सच्ची नींव होते हैं।

Friday, September 4, 2026

कालिदास की वैज्ञानिक चेतना

घने वनों के नीरव प्रांतर में कुल्हाड़ी की 'ठक-ठक' की आवाज़ गूँज रही थी। इतिहास के गर्भ में छिपे एक सुदूर ग्रामीण अंचल में, एक नितांत अज्ञानी और मूर्ख व्यक्ति एक विशाल वृक्ष की उसी डाल पर बैठकर उसे कुल्हाड़ी से काट रहा था, जिस पर वह स्वयं टिका हुआ था। यह घटना केवल एक व्यक्ति की अज्ञानता का प्रत्यक्ष दृश्य नहीं थी, बल्कि यह उस महान प्रतीकात्मकता का प्रस्थान बिंदु थी, जहाँ से संपूर्ण भारतीय मनीषा का एक नया अध्याय आरंभ होने वाला था। अज्ञानता और विवेकहीनता के इसी चरम बिंदु से देवी काली की अनुकंपा और चेतना का वह महाविस्फोट हुआ, जिसने उस मूढ़ कुल्हाड़ी वाले को 'कालिदास' बना दिया—एक ऐसा महाकवि, जिसने आगे चलकर अपनी कालजयी लेखनी से संस्कृत साहित्य को सर्वथा नवीन मायने, रूप और वैज्ञानिक आयाम प्रदान किए।

​कालिदास केवल संस्कृत साहित्य के अप्रतिम रूपकार और कवि नहीं थे, बल्कि वे प्राचीन भारत के एक सूक्ष्म अन्वेषक, भूगोलवेत्ता और वनस्पति-शास्त्री भी थे। जब अठारहवीं शताब्दी के अंत में सर विलियम जोन्स ने प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन व अनुवाद से कालिदास के इस महान सृजन को विश्व साहित्य के सामने रखा, तब वैश्विक साहित्य मंच पर एक ऐसा अप्रतिम व्यक्तित्व उभरा जिसने पश्चिमी जगत की उस रूढ़िवादी धारणा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया कि भारत में केवल अध्यात्म, दर्शन और पारलौकिक विषयों पर ही चिंतन हुआ है। कालिदास की रचनाएँ—मेघदूतम्, ऋतुसंहारम्, रघुवंशम्, कुमारसम्भवम्, अभिज्ञानशाकुंतलम्, मालविकाग्निमित्रम् और विक्रमोर्वशीयम्—यह सिद्ध करती हैं कि प्राचीन भारतीय मानस में ऐहिक जगत, वैज्ञानिक अवलोकन और भौतिक प्रकृति के प्रति कितना गहरा अनुशीलन था। उनकी ये कृतियाँ भारतीय उपमहाद्वीप के प्राकृतिक भूगोल, मौसमी चक्र (मानसून), प्राणिजगत और वनस्पतिजगत का एक अत्यंत प्रामाणिक व काव्यात्मक दस्तावेज़ प्रस्तुत करती हैं।

​यह भौगोलिक एवं पर्यावरणीय यथार्थ कालिदास की काव्य-यात्रा में एक निश्चित दिशा का अनुसरण करता है। मेघदूतम् में यक्ष द्वारा मेघ को बताया गया यात्रा-मार्ग प्राचीन भारत के अंतर-राज्यीय मार्गों और नदी-घाटियों का सटीक चित्रण करता है। रामगिरि (आधुनिक सरगुजा, छत्तीसगढ़ का रामगढ़ पर्वत) से यात्रा प्रारंभ कर मेघ पश्चिम-दक्षिण-पश्चिम की ओर विंध्य-मैकल श्रेणियों के पर्वतीय अवरोधों के अनुकूल मोड़ लेते हुए अमरकंटक पहुँचता है। अमरकंटक के पके आम्र-वनों से ढके शिखर और वहाँ से बहती रेवा (नर्मदा) का वर्णन भू-आकृतिक दृष्टि से अत्यंत सटीक है:

"त्वमासारप्रशमितवनोपप्लवं साधु मूर्ध्ना, वक्ष्यत्यध्वश्रमपरिगतं सानुमानाम्रकूटः।"

(अर्थात: वनाग्नि को अपनी वर्षा से शांत करने वाले और यात्रा से थके हुए तुम मेघ को अमरकंटक पर्वत अपने मस्तक पर अत्यंत आदर से धारण करेगा।)


​इसी भौगोलिक प्रवाह में आगे बढ़ते हुए, नर्मदा घाटी का अनुसरण करते हुए मेघ दशार्ण (बुंदेलखंड), विदिशा, वेत्रवती (बेतवा) और नीचैः पर्वतों से गुज़रता हुआ उज्जयिनी (उज्जैन) पहुँचता है। उज्जयिनी के लिए यक्ष का आग्रह कि "वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशाम्" (यद्यपि उत्तर दिशा की यात्रा में मार्ग थोड़ा टेढ़ा ही क्यों न हो जाए, फिर भी उज्जयिनी अवश्य जाना), यह दिखाता है कि कालिदास को प्राकृतिक नदी-मार्ग और मानव-निर्मित सांस्कृतिक मार्गों के अंतर की स्पष्ट समझ थी। इसके बाद मंदसौर (दशपुर), चर्मण्वती (चंबल), कुरुक्षेत्र, सरस्वती, कनखल (हरिद्वार) में गंगा के मैदानों को लाँघते हुए मेघ हिमालय में प्रविष्ट होता है। वहाँ क्रौंच रंध्र (माना/नीति दर्रा) से होकर कैलाश और मानसरोवर (अलकापुरी) तक का मार्ग तत्कालीन व्यापारिक और प्रवासी मार्गों को रेखांकित करता है।

​कालिदास का यह भौगोलिक संदर्शन केवल मैदानी या मध्य-भारतीय मार्गों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक संपूर्ण भारतवर्ष को आच्छादित करता है। रघुवंशम् के तेरहवें सर्ग में कालिदास ने श्रीलंका विजय के पश्चात पुष्पक विमान से अयोध्या लौटते हुए भगवान राम द्वारा सीता को दिए गए प्राकृतिक और भौगोलिक वर्णन के माध्यम से भारत की विविध भू-आकृति का अद्भुत खाका खींचा है। आकाश से समुद्र और नदियों के संगम का दृश्य देखते हुए श्री राम सीता से कहते हैं कि यह विशाल समुद्र ऐसा प्रतीत होता है मानो पृथ्वी को बाँधने वाली कोई गहरी नीली माला हो:

"वैदेहि पश्यामलयाद्विभक्तं मत्सेतुना फेनिलमम्बुराशिम्। छायातपेनेव तमःप्रकाशं द्विधा विभक्तं मरुमार्गमिव॥"

(अर्थात: हे वैदेही! देखो, मेरे द्वारा बनाए गए सेतु से यह फेनिल समुद्र दो भागों में बँटा हुआ है, जैसे धूप और छाया से रात और दिन का भेद होता है।)

इसके साथ ही राम प्रयागराज में गंगा और यमुना के संगम का जो प्राकृतिक-चित्रण करते हैं, वह कालिदास की दृश्य-कल्पना का अनुपम उदाहरण है:

"क्वचित्प्रभा लेपिभिरिन्द्रनीलैः मुक्तामयी यष्टिरिवानुविद्धा..."

(अर्थात: कहीं श्वेत गंगा के जल में नीली यमुना का संगम ऐसा लगता है मानो नीलम मणियों के बीच मुक्ताओं की माला पिरोई गई हो, तो कहीं नीले कमलों की माला के बीच सफ़ेद कमलों की पाँति तैर रही हो।)


​स्थल-रूपों के इस व्यापक विस्तार के साथ-साथ, कालिदास इस पूरे भूगोल को मानसूनी बादलों की भौतिक गतिशीलता से गतिमान करते हैं। मेघदूतम् केवल विरह-काव्य ही नहीं, बल्कि भारतीय मानसून का काव्यात्मक और वैज्ञानिक आलेख भी है। कालिदास द्वारा चित्रित आषाढ़ के प्रथम दिवस मेघ का आगमन ("आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुम्") आधुनिक मौसम विज्ञान के 'जेट स्ट्रीम सिद्धांत' (Jet Stream Theory) से अद्भुत तालमेल रखता है। आधुनिक मौसम विज्ञान के अनुसार, ग्रीष्म ऋतु के अंत में जब क्षोभमंडल (Troposphere) की उपोष्णकटिबंधीय पछुआ जेट स्ट्रीम (Subtropical Westerly Jet Stream) हिमालय के उत्तर की ओर विस्थापित होती है और तिब्बत के पठार के अत्यधिक गर्म होने से समताप मंडल के निचले भाग में 'पूर्वी उष्णकटिबंधीय जेट स्ट्रीम' (Tropical Easterly Jet Stream) का विकास होता है, तभी दक्षिण-पश्चिम मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा भारत के प्रायद्वीपीय और मध्य भाग में प्रवेश करती है।

​यक्ष द्वारा अमरकंटक, मालवा और गंगा के मैदानों की ओर मेघ के प्रवाह का वर्णन ठीक उसी वायुमंडलीय परिसंचरण का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे जेट स्ट्रीम द्वारा निर्मित निम्न वायुदाब (ITCZ) उत्तर की ओर खींचता है। पर्वतों (आम्रकूट, नीचैः, हिमालय) से टकराकर मेघों का भारी जलवृष्टि करना आधुनिक भौतिक भूगोल के पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall) के नियमों के पूर्णतः अनुकूल है। यक्ष मेघ से कहता है कि अमरकंटक पर जल गिराने के बाद जब तुम हल्के होकर द्रुततर गति वाले हो जाओगे, तो तुम्हारी उड़ान तेज़ हो जाएगी:

"तस्माद् गच्छेरनुकूलपवणो भावयन् कल्पवृक्षम्..."

और आगे चलकर वेत्रवती, गंभीरा तथा चर्मण्वती से पुनः जल ग्रहण (Recharge) कर मेघ अपनी आर्द्रता बनाए रखता है।


​वर्षा के इस जल-चक्र और मानसूनी जेट स्ट्रीम के प्रवाह के साथ ही भारत की वनस्पतियाँ अपने ऋतु-बद्ध रूप में प्रकट होने लगती हैं। ऋतुसंहारम् और मालविकाग्निमित्रम् में कालिदास ने ऋतु-चक्र के अनुसार खिलने वाले पुष्पों और वृक्षों का सूक्ष्म वर्गीकरण किया है। वसंत में ढाक/किंशुक (Butea monosperma) के लाल-नारंगी फूलों की तुलना कालिदास ने "पृथ्वी पर फैली अग्नि-शिखाओं" और "कामदेव के नख-क्षतों" से की है:

"पुंस्कोकिलैः कलकूजितनैरुन्मदानि, किंशुकैः कुसुमितैश्च वनान्तराणि।"

(अर्थात: खिले हुए किंशुक के अग्नि-समान लाल पुष्पों और कोयल की कूक से वन-प्रांतर मत्त हो उठे हैं।)

अमलतास/कर्णिकार (Cassia fistula) के सुनहरे फूलों को कानों का आभूषण और आम की चूत-मंजरी को कामदेव का अमोघ बाण बताया गया है। ग्रीष्म की तपन से राहत के लिए पाटल (Stereospermum suaveolens), मल्लिका व मालती (चमेली की प्रजातियाँ) और कमलों का वर्णन है। शीतल जल में तैरते पाटल-पुष्प और खस/उशीर (Vetiveria zizanioides) का लेप ग्रीष्मकालीन जीवन-शैली को दर्शाते हैं।


​पौधों के केवल भौतिक सौंदर्य को दर्शाने के बजाय, कालिदास मानव-चेतना और वनस्पति-जगत के बीच एक भावनात्मक सेतु भी बाँधते हैं। संस्कृत काव्य-शास्त्र की 'दोहद' (वृक्षों की विशेष अभिलाषा) परंपरा का सुंदर प्रयोग कालिदास के काव्य में बहुतायत से मिलता है। मालविकाग्निमित्रम् में सुंदर स्त्री (मालविका) के बाएं पैर के नूपुर-युक्त प्रहार से रक्ताशोक का खिलना और मेघदूतम् में नायिका के मुख से मदिरा के आचमन या कुल्ले से बकुल (मौलसिरी) का पुष्पित होना, मनुष्य और वनस्पति के गहरे तादात्म्य को व्यक्त करता है:

"रक्ताशोकश्चलविटपयोः पादघातादेकः, काङ्क्षत्यन्यो वदनमदिरादोहदच्छद्मेन।"

(अर्थात: अशोक वृक्ष सुंदरी के नूपुर-युक्त चरण-प्रहार की और बकुल वृक्ष उसके मुख की मदिरा के छिड़काव की अभिलाषा रखता है।)

यह परंपरा प्राचीन भारतीय समाज में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और वृक्षों को सजीव मानकर उनके संवर्धन की चेतना को दर्शाती है।


​जब मानसूनी जेट स्ट्रीम का प्रभाव कम होता है और उत्तर-पूर्वी हवाएँ लौटने लगती हैं, तो यही प्रकृति अपने सबसे धवल और निर्मल रूप में निखरती है। शरद ऋतु का आगमन कालिदास के काव्य में प्रकृति का सबसे उल्लासपूर्ण चरण है। इस ऋतु में कास या कांस घास (Saccharum spontaneum) के खिलने को 'प्रकृति की हँसी' या 'शरद सुंदरी का श्वेत वस्त्र' कहा गया है, जो वर्षा के अंत और स्वच्छ आकाश का प्रतीक है:

"कासैः कुसुमैरिव शुभ्रवस्त्रा, प्रफुल्लकमला विकचाननाब्जा। कलहंसस्वनैनूपुरनिस्वनेन, सम्प्रति आयाति शरद नववधूरिव॥"

(अर्थात: कांस के सफेद फूलों रूपी वस्त्र पहने, कमलों रूपी हँसते मुख वाली और हंसों के कलरव रूपी घूँघरू बजाती हुई शरद ऋतु नववधूरूप में आ पहुँची है।)

इसी समय सप्तपर्ण या चितवन (Alstonia scholaris) के फूलों से निकलने वाली तीव्र मादक गंध पूरे वनों को महका देती है, जिसकी तुलना कवियों ने मत्त हाथी के 'मद' से की है। वहीं, वर्षा ऋतु के बाद जब जल निर्मल होता है, तो मानसरोवर से लौटने वाले 'कलहंस' और 'राजहंस' ताल-तलैयों की शोभा बढ़ाते हैं।


​मैदानी और हिमालयी ऋतु-वैभव को चित्रित करने के बाद, कालिदास की दृष्टि सुदूर दक्षिण-पश्चिम भारत के तटीय और पर्वतीय वनों की ओर मुड़ती है। कालिदास ने सह्याद्रि (पश्चिमी घाट) और मलबार तट के उष्णकटिबंधीय वनों का विशद वर्णन किया है। रघुवंशम् में सम्राट रघु की दक्षिण यात्रा के दौरान सह्याद्रि की तलहटी में चंदन के तनों से लिपटी इलायची (एला-लता), लौंग (लवंग) और काली मिर्च (मरिच-लता/Piper nigrum) का वर्णन मिलता है:

"मरीचवेल्लितस्कन्धान् स ताम्रपर्णीमतीतयान।"

(अर्थात: जहाँ काली मिर्च की लताएँ वृक्षों के तनों से लिपटी हुई थीं, रघु की सेना ने उस प्रदेश को पार किया।)

इसके अलावा, पश्चिमी घाट के पर्वतीय ढलाणों पर कई वर्षों के अंतराल में एक साथ खिलने वाली कार्वी (Strobilanthes) और कुरुबक के बैंगनी-नीले पुष्प-गुच्छों का उल्लेख मिलता है। अभिज्ञानशाकुंतलम् में शकुंतला की विदाई के समय प्रकृति के शोक का वर्णन करते हुए कालिदास लिखते हैं—"उद्गलितदर्भकवला मृग्यः" (हरिनियों के मुँह से घास के निवाले छूटकर गिर पड़े), जो कालिदास की करुणा और वनस्पति-चेतना को उजागर करता है।


​वृक्षों और लताओं के इस सजीव परिवेश में पक्षियों और पशुओं की सह-उपस्थिति कालिदास के पारिस्थितिक परिदृश्य को पूर्णता प्रदान करती है। कालिदास का प्राणि-विज्ञान अत्यंत गहरा और व्यावहारिक प्रेक्षण पर आधारित था। मेघदूतम् में वर्णित 'हंसद्वार' या 'क्रौंच रंध्र' से गुजरने वाले पक्षी वैज्ञानिक रूप से बार-हेडेड गूज़ (Anser indicus) हैं:

"प्रालेयाद्रेुरुप तटमतिक्रम्य तांस्तांश्च विशेषान्, हंसद्वारं भृगुपतिपशोर्यत्प्रसिद्धं भङ्गाय।"

(अर्थात: हिमालय की ढलानों को पार करके उस प्रसिद्ध 'हंसद्वार'/क्रौंच रंध्र पहुँचो, जिससे होकर हंस मानसरोवर की ओर जाते हैं।)

चक्रवाक (Tadorna ferruginea) को उन्होंने दांपत्य-निष्ठा और विरह का प्रतीक माना, जो रात में अलग होने पर एक-दूसरे को पुकारते हैं। चातक (Clamator jacobinus) का मानसून के ठीक पहले अफ्रीका से आना और केवल मेघ-जल की आस रखना—"वामश्चायं नदति मधुरं चातकस्ते सगन्धः"—तथा मयूर (Pavo cristatus) का मानसून में प्रजनन काल के दौरान पूंछ-पंख फैलाकर नाचना, कालिदास के काव्य को प्रामाणिक पक्षी-विज्ञान से जोड़ता है।


​गुप्त साम्राज्य और वाकाटक राजवंश के बीच हुई ऐतिहासिक वैवाहिक संधि ने महाकवि कालिदास की चेतना को एक नया विस्तार प्रदान किया। चंद्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' की पुत्री प्रभावतीगुप्त और वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय के विवाह के उपरांत, रुद्रसेन की असामयिक मृत्यु हो जाने पर प्रभावतीगुप्त ने विदर्भ के शासन की बागडोर संभाली। इस संक्रमण काल में कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने और प्रशासनिक सहयोग हेतु विक्रमादित्य ने कालिदास को अपने दूत के रूप में विदर्भ और कोंकण तटवर्ती क्षेत्रों में भेजा। इस ऐतिहासिक कूटनीतिक प्रवास का उल्लेख प्रभावतीगुप्त के 'पुणे' व 'ऋद्धपुर' ताम्रपत्रों, क्षेमेंद्र कृत 'औचित्यविचारचर्चा' में उल्लिखित कालिदास के ग्रंथ 'कुंतलेश्वरदौत्यम्', तथा प्राकृत काव्य 'सेतुबंध' के संपादन संबंधी ऐतिहासिक साक्ष्यों में स्पष्ट रूप से मिलता है।

​विदर्भ की राजधानी नंदीवर्धन, रामगिरि (रामटेक) और कुंतल (कोंकण) के इस प्रत्यक्ष प्रवास ने कालिदास को दक्षिण-पश्चिम भारत की अनूठी भौगोलिक, महासागरीय और पारिस्थितिक विविधता को अत्यंत निकट से अनुभव करने का अवसर दिया। रामगिरि के शिखरों पर घिरते मेघों से 'मेघदूतम्' की प्रेरणा, सह्याद्रि की ढलानों पर एला, मरिच व चंदन के वनों का यथार्थ चित्रण और 'रघुवंशम्' में वर्णित पश्चिमी समुद्र तट का भूगोल इसी ऐतिहासिक भ्रमण की जीवंत देन थे। प्रत्यक्ष दर्शन से उपजी प्रकृति की यही प्रामाणिक संवेद्यता आगे चलकर भारतीय साहित्य, रंगमंच और सिनेमा के लिए एक शाश्वत प्रेरणा-स्रोत बन गई।

​मोहन राकेश के प्रसिद्ध नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' में कालिदास और मल्लिका का संबंध इसी प्राकृतिक व आत्मीय यथार्थ पर आधारित है, जहाँ वर्षा की पहली बूँदों से लेकर वनों की कास-घास तक सब कुछ मानवीय संवेदनाओं का रूपक बन जाता है। सत्यजीत रे की विश्वप्रसिद्ध फिल्म 'पाथेर पांचाली' में अपू और दुर्गा का कास-फूलों के समुद्र के बीच से गुजरते हुए रेलगाड़ी देखना कालिदास की इसी प्रत्यक्ष प्रेक्षण परंपरा का आधुनिक दृश्य-शिल्प है, जहाँ प्रकृति कौतूहल और जीवन के बदलाव का माध्यम बनती है। यहाँ तक कि 'बड़े अच्छे लगते हैं' जैसे आधुनिक संगीत में हरी घास, ओस की बूंदों और बादलों का जो सहज चित्रण मिलता है, उसकी मूल धारा कालिदास के उसी ऐतिहासिक प्रवास से प्रस्फुटित होती है। इस प्रकार, हमे एक सृजक मिलता है जोअपनी आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से  कला को नए संदर्भों में विश्लेषित करता है जैसे पंद्रहवीं सदी में शेक्सपियर से लेकर द विंची ने व्यक्त किया,,,, पुनर्जागरण या रेन्साआ 

Sunday, August 30, 2026

मैकल का मानसून

विरही मेघ कालिदास के

 उमड़ते,, पर्वत के भाल पर 

प्रथम तिलकोत्सव रचते हैं,

तब विन्ध्य की अंजलि से छिटकी

मैकल की उपात्यकाएं और शिखर 

आदिम स्पंदन से जगते हैं।

​आषाढ़ पर ऐसे ताव से

टूटती है तड़ित क्रोध में

धरती की प्यासी छाती पर

बूंदों की झंकृत तान ,,

कीटों संग राग छेड़ती है

फिर ​हर जन्मदिवस भांति

—मेकल-पुत्री रेवा 

शिलाओं के कठोर वक्ष को चीरकर,

कल-कल छल-छल करती,

किल्लोल कर उतरती है,

​साल के सघन वनों में 

फिसलती काई भरी मोड़ों से

हरी पन्नों सज्जित वल्लरी झुंडों से

झुपते बैगाओं के मांदर की थाप पर

नवरंग और चातक की पुकार 

गूँज उठती हैं गहरी घाटियाँ,

कंद-मूल और करील की महक से

आदिम जीविषा मुस्कुराती है।

​रातों की विकट नीरवता में

जुगनू बुनते हैं  नक्षत्र-लोक,

ओट में दुबके लंगूर झांकते

मृग मयूर झुंडों को पुकारते 

देवी का व्याघ्र गरजता है

आखिर

कांस की बूढ़ी बालियाँ

हवा में चँवर डुलाने लगती हैं,

रेवा का मटमैला वेग

पारदर्शी हो चलता है।

​ विदा ऐ मानसून

किसी अंत की आहट नहीं,

यह तो मेकल-पुत्री के अमर प्रवाह में

सृष्टि के अटूट प्रेम का

पुनर्जन्म है।

Wednesday, August 26, 2026

कास (कांस) घास: परंपरा, का धवल सौंदर्य   

आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण में घांस के फूलने का वर्णन कुछ इस तरह किया है

काशपुष्पैः प्रतीच्छन्ना गौरांगीयं वसुंधरा।" (अर्थ: यह पृथ्वी कास के सफेद फूलों से ढककर गौर वर्ण (सफेद कांति) वाली सुंदरी जैसी शोभा पा रही है।)भारतीय उपमहाद्वीप में कास का फूलना मानसून की समाप्ति और शरद ऋतु के आगमन का सूचक माना गया है तुलसी दास जी भी किष्किन्धा कांड में कहते है। फूले कास सकल महि छाई। जनु बरसा कृत प्रगट बुढ़ाई ''

​ 'कांस' या 'कास' (वैज्ञानिक नाम: Saccharum spontaneum) ऐसी   दिव्य और जुझारू घास है जिसने भारतीय संस्कृति में गहरा प्रभाव छोड़ा है



​कांस घास वनस्पति विज्ञान के घास कुल (Poaceae family) का सदस्य है और इसे गन्ने (Saccharum officinarum) का जंगली रिश्तेदार माना जाता है। इसमें परागण मुख्य रूप से हवा द्वारा (Wind Pollination / Anemophily) होता है। इसके फूले हुए मंजरों से हल्के परागकण हवा में तैरते हैं और इसका पंखदार वर्तिकाग्र उन्हें आसानी से ग्रहण कर लेता है। इसके बीज बहुत छोटे और रुई जैसे सफेद रेशों से ढके होते हैं, जो पकने पर हवा में छोटे-छोटे पैराशूट की तरह उड़कर मीलों दूर तक फैल जाते हैं। बीजों के अलावा, यह जमीन के नीचे छिपे अपने मजबूत प्रकंदों (Rhizomes) के जरिए भी तेजी से कायिक प्रवर्धन करती है।

​यह घास केवल भारत तक सीमित न होकर नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यानमार, चीन, मिस्र, सूडान और भूमध्यसागरीय यूरोप तक फैली हुई है। भारत की विभिन्न बोलियों और भाषाओं में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। गोंडी में इसे कास या कसार, संथाली में कास बाहा, कुड़ुख व मुंडारी में कासी, और भीली में कांसड़ो कहा जाता है। दक्षिण भारत की द्रविड़ भाषाओं में इसे मुख्य रूप से गन्ने से जोड़कर देखा जाता है—तेलुगु में रेल्लु गड्डि या काकि चेरुकु (जंगली गन्ना), तमिल में पेक्करिम्बू, कन्नड़ में काडु कब्बू और मलयालम में नन्नना कहा जाता है।

​सनातन और जनजातीय परंपराओं में कांस का स्थान अत्यंत पवित्र है। इसे सूर्य देव की दीप्ति और प्रकाश का प्रतीक माना गया है, वहीं जल तटों पर उगने के कारण इसके मूल में वरुण देव और शेषनाग (बलराम स्वरूप) का वास माना जाता है। हल षष्ठी (खमरछठ) के व्रत में संतान की सुरक्षा के लिए महिलाएँ कांस की झाड़ी (छितरी) गाड़कर पूजा करती हैं। सनातनी विवाह संस्कारों में मंडप (मड़वा) को छाने, वेदी पर बिछाने और हल्दी की रस्म में शीतलता व बुरी नज़र से बचाव के लिए कास का प्रयोग अनिवार्य है, वहीं संकल्प के समय कास या कुश की बनी 'पवित्री' पहनी जाती है।

​मध्य भारत की बैगा, गोंड, संताल और कोरकू जनजातियों की लोककथाओं में कांस को 'सृष्टि की पहली घास' माना गया है, जिसे बड़ा देव ने पृथ्वी को स्थिरता देने के लिए उगाया था। छत्तीसगढ़ी और जनजातीय ददरिया गीतों में कास के खिलने को प्रेम, विरह और पर्वों के संकेत के रूप में गाया जाता है— "नदी के तीर-तीर फूले हे कास रे, तोर मया म गोरी, छूट गे प्यास रे..."

​धान और कांस का पारिस्थितिक और सांस्कृतिक रिश्ता भी बहुत अटूट है। दोनों एक ही 'पोएसी' परिवार के सदस्य हैं। किसानों के लिए कांस के सफेद फूलों का खिलना इस बात का प्राकृतिक संकेतक है कि मानसून विदा ले रहा है और धान की फसल में दूध भर रहा है। छत्तीसगढ़ी में यह कहावत बहुत प्रसिद्ध है— "जब नदिया पार म कास फूले, तब खेत म धान झूले।"

​प्राचीन कला और साहित्य में भी कास का व्यापक अंकन मिलता है। महाकवि कालिदास ने 'ऋतुसंहारम्' में शरद ऋतु का वर्णन करते हुए लिखा है कि शरद रूपी नवोढ़ा दुल्हन ने काश के सफेद फूलों की साड़ी पहन रखी है ("काशपुष्पांसुका देवि...")। सांची व भरहुत के स्तूपों, अजंता के गुफा चित्रों और महाबलीपुरम के 'गंगावतरण' शिल्प में आश्रम जीवन और तराई के दृश्यों को दर्शाने के लिए कास की झाड़ियों का अंकन मिलता है। मेगास्थनीज (इंडिका) और ह्वेनसांग (सी-यू-की) जैसे विदेशी यात्रियों ने गंगा व तराई के घने सरकंडों व विशाल घास के मैदानों का वर्णन किया, जबकि आधुनिक वैज्ञानिक कार्ल लिनिअस ने इसका नाम Saccharum spontaneum रखा और विलियम रोक्सबर्ग ने इसके औषधीय व भौतिक गुणों का दस्तावेजीकरण किया।

​पर्यावरण और आयुर्वेद की दृष्टि से कास अत्यंत उपयोगी है। काजीरंगा और तराई क्षेत्रों में एक-सींग वाले गेंडे, जंगली भैंसे, हाथी, बारहसिंगा और दुर्लभ हिसपिड खरगोश इसे चाव से खाते हैं। इसकी गहरी जड़ें नदियों के कटाव (Soil Erosion) को रोकती हैं। आयुर्वेद में यह 'तृणपंचमूल' का एक मुख्य घटक है, जो मूत्र विकार, पथरी और शरीर की आंतरिक जलन को शांत करने में औषधि का काम करती है।

​कांस घास प्रकृति का एक ऐसा अनमोल उपहार है जो बंजर जमीन पर भी सहर्ष उग आता है। यह हमें सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी कैसे जुझारूपन से खिलखिलाकर जिया जाता है। नदियों के किनारों पर झूमते इसके सफेद मंजर न केवल शरद के आगमन का संदेश देते हैं, बल्कि भारत की प्राचीन चेतना, साहित्य और लोक-जीवन को आज भी जीवंत बनाए हुए हैं।

Tuesday, August 25, 2026

बदल गया है

हसरतों के हरियाने वास्ते
ये डेहरी,,, लांघनी  होगी
फैली है दुनिया की चौहद्दी 
बाड़ पार ,, मापनी होगी
ये जद्दोजहद मै करूंगी
अकेले ,,, खुद के साथ 
खोजने खुद को,,
कहते है जमाना बदल गया है
उस बदलाव की असलियत
अब जाननी होगी




Monday, August 17, 2026

सूरज के आते भोर हुआ, लाठी लेझिम का शोर हुआ।

यह नागपंचमी झम्मक-झम, यह ढोल-ढमाका ढम्मक-ढम। 

हिंदी पाठ्य पुस्तकों की प्राथमिक कक्षा में सुधीर त्यागी जी की यह कविता सस्वर गाई जाती थी,,,सावन की पंचमी के दिन विद्यार्थी ,,खाखी हाफ पेंट और सफेद शर्ट पहने,,अपनी स्लेट पट्टी पर नाग नागिन जोड़े उकेरते बड़े मनोयोग से,,, ताजा खीरा और अगरबत्ती साथ ही चुटकी भर अबीर, की पुड़िया,,,और झुंड बना कर कूच करते ,,,स्कूल की ,ओर,,,मैदान के बीचों बीच ध्वजा रोहण की गोल वेदी पर टिके काले तख्ते को जिसे इस रोज खास तौर पर ,,काले कोयले से पोता जाता रहा,,,और कोई कुशल कलाकार शिक्षक,,,उसमें बड़े नाग नागिन का सफेद और अन्य रंगीन चाक से आकृति मनोयोग से बनाते,,,

Sunday, August 16, 2026

सोशल स्टेट

इसे चोरी कहो या नक़ल-चोरी,

हमने तो बस राहें मोड़ी।

सीखा तो इसलिए भी नहीं कि हमने कभी पूछा था,

प्रकृति का पन्ना-पन्ना ही पाठ सिखाने को खुला था।

​अरसे से जंगली भैंसों ने,

मोटी घास को चर-चर कर छाँटा था,

ताकि बारिश की पहली बूँद से पहले,

कोमल नन्हीं दूब को उगाने का रास्ता बाँटा था।

​चींटियों की वो मौन समझदारी,

सफेद इल्लियों को पत्तों पर चराती थी,

बदले में मिले मिठास के रस से,

अपनी छोटी-सी दुनिया चलाती थी।

​दर्जिन चिड़िया पत्तों को सिलती थी,

बुनकर चिड़िया नीड़ बुनती थी,

इंसान ने देखा, समझा और सीखा,

उनकी कारीगरी से अपनी कला चुनी थी।

​प्रकृति के इस खुले द्वार से,

मानव ने हुनर का हर पाठ पढ़ा,

पर जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता गया,

अहंकार का दायरा और बड़ा।

​फिर हुनर के संग-संग उसने,

मक्कारी की नई चाल भी सीख ली,

बाँटने की जो रीत थी जग की,

उसे अपनी मुट्ठी में भींच ली।

​आज वो सब जानता है जो वे जानते हैं,

पर विडंबना का दायरा देखिए—

जो कुछ भी उसने सीखा है इस जहाँ से,

अब अपने सिवा किसी और को नहीं बताता!