जब मैं मर जावउँग तब क्यू दुखी होना
कर्जदार के मैयत में,,सिक्के नही उछाले जाते
बयाना जो बांकी है वो बेफिक्र हो वसूल कर लो
हकदार की हकीकत से जज़बात नही आंके जाते
Tuesday, October 15, 2019
मृत्यु
मृत्यु से पहले
मृत्यु से पहले वो जिंदा था
या फिर शायद नहीं
वो मरने के बाद,,,,अब महसूस कर पाया
कि जिंदा है,,मर कर भी
अनुभव
Thursday, October 3, 2019
गांधी जी स्वर्ग में आश्वश्त होकर बस सोने ही जा रहे थे,,उनकी जयंती पे कम से कम एक दिन शराब बंदी और पशुवध हिंसा से मुक्त था,,और ठीक उसी वक्त पृथ्वी लोक से शोर उठा,,,मादर चोद,,, ठांय ठांय,, बुलठू भैया अपनी आखिरी छुरेबाजी के मुजायरे के बाद छाती में गोली खा कर औंधे पड़े थे,,,पर कातिल कांप रहा था,,, क्योंकि बुलठू पाठक मरते मरते भी बोला,, फेर आंहु मादर चोद,,रुक
रायपुर शहर इन दिनों काफी बदल चुका है,,अस्सी के दशक में 10 थाना छेत्रों से
Saturday, September 28, 2019
बरहा और जेपरा
जेपरा औ बरहा,,
धकर लकर झाड़ चघा,,औ झाड़ कौन ,,बमरी ,,कांटा कुण्टी ले छेदा गया जेपरा,,लुंगी छूट गया रह गया ,,हरियर चड्डा और लटकता नाड़ा,,,फेर नई उतरा,, काबर नीचे बरहा छेक के बैठा जो था,,घों घों करता ,,,,,,जेपरा का हाथ गोड़ खोर्रा गया था,,लहू बोहा रहा था,, घों घों ,,,सारा बेटा खेत मे खोन्दरा तान के,,पीला दे दिया,,,अब कर ले लुवाठ खेती किसानी
धान खेत के बिच्चो बीच,,,जंगली सूरा का खोन्दरा,,जेपरा आवेदन धरे किंजर रहा,,ये आफिस ले ओ ऑफिस ,,तहसीलदार किथे,, जंगली जीव है माने बनविभाग का मामला,,,रेंजर साहेब बोले,, आधा नुकसानी में होता है मुमावजा या फेर गोड़ हाथ तोड़वाये मे,,,खोरचाये हपटाये का कोई हिसाब नही,,, ,,जंगल गार्ड भेज के खेदवा देंगे, ,,दु हप्ता पहिले,,फेर वहा रे विधान आज ले कोई सुध नही ले रहा,, औ बरहा घेरी बेरी होदरने करता है,,,बिककट अल्हन है भाई,, सूरा मार सुतली बम में आटा लपेट के रात के डार दे,, सरपंच का आडिया है,, किसे करबे,,
बिहिनिया खार में सूरा छर्री दर्री पड़ा था,,,जबड़ा फूट गया ,,अब क्या,,, भून के मास खाओ खतम करो,,,जम्मो पंचायत खाया बांट के ,,फेर कम नही पड़ा तो सोखा दो,,बिककट मिठाया रहा,,जेन नई चखा ,,कल्लायेगा ही,,सब्बो अधिकारी एक्के दिन धावा मारा दिया,,,सोखडी मांस,,बयान,,मौका जांच,,पंचनामा,,, बनपशु को मारा,, है खाने खातिर,,,कौन कौन खाया सब्बो अंदर,,,होगा,,,,रेंगजर साहब धार्मिक मनखे था,, बिष्णु अवतार को मार दिया रे,,बराहा अवतार,,हा ,,हा ,,हा गम्भीर धारा लगेगा,,जेपरा उखरू बैठ के सोंच रहा था,,, मोला होदरत रिहिस तो ओखर उप्पर कोनो धारा नई,,वाह रे कानून एकतरफा, पेला रहा है,
सरपंच गार्ड से गोठिया रहा है,,समाधान निकले साहब तो सब्बो का भला हो,, मामला जम गया दिखता है,,, गरुवा डाक्टर पोस्टमार्टम कर दिया,,,देवार डेरा का देशी सूरा है,,,,जंगली पशु अधिनियम में नही आता,,,जेपरा का जान बच गया,,फेर धान,,, एक गाड़ा बेंच के हुआ ऊपर से निच्चे तक का मुवावजा चुक्ता,, धान खेत ले अभी भी आवाज आता है,,घों घों,, फेर जेपरा अब नई भागता,,, क़ानून बोला है,,देशी सूरा है
अनुभव
Sunday, September 1, 2019
पीहू
बिटिया ,,तुम बड़ी होकर कुछ बन जाना
ठीक है बन जाउंगी,,
क्या बनोगी ??बताओ जरा
अभी नही बताउंगी
जब बड़ी होंवूगी ,,
तब ,,सीधे बनके दिखाउंगी!!!!
पापा की पीहू को हैप्पी बर्थ डे,,,
Saturday, August 17, 2019
चार चिन्हारी
चार चिन्हारी,,
जब प्राथमिकताएं बदलें तो पहले पहलअचरज आम बात है,,,बड़ी विकास योजनाओं की जगह जिक्र नरवा गरवा घुरवा बारी का हो,,तो प्रश्न लाजमी हो जाता है,,कि,, आखिर क्यूँ,,,,,प्रगति की प्रकृति जितनी जमीनी होगी,,विकास उतना समानवेशी होगा,,छतीसगढ़ के,गढ़ रायपुर,, दुर्ग ,बिलासपुर जैसे नगरीय केंद्रों,, के स्रोत हमारे ग्राम्य और वनप्रदेश है,,,भिलाई इस्पात संयंत्र या उरला के कारखानों के बहुत पहले से यंहा का उद्यमी किसान ,,बनिस्बत कम उपजाऊ लाल माटी में ,,,अपने तकनीकी ज्ञान से दुबराज ,,जवां फूल की सुनहरी बालियां उगाता आ रहा था,,मूलतः माटी के इसी जुड़ाव से छत्तीसगढ़ की भाषा,,नृत्य,,आहार,,पहनावे,,का जन्म हुआ है
,,,जो कभी धान के खेत नही बूड़ा ,,वो छत्तीसगढ़ को गेंड़ी चढ़ कर ही देख रहा है,, बात नरवा की हो तो ये हर गाँव के आसपास से मानसूनी जल को भूजल से जोड़ने वाली आदिम धरातलीय जल रेखाएं है,, जिसमे डुबकियां लगा कर यंहा का बचपन जवां होता है,,गरवा हमारा वो पशुधन है जो आधुनिक कृषि व्यवस्था के चपेट में आकर अब जुगाली करता,,आपकी गाड़ी का रास्ता रोक लेता है,,पर छेने पे सिकी कपूरी रोटी आज भी उतना ही सुवाद देती है,,देशी गाय के घी की छौक आज कितनो की किस्मत में है,,गोबर्धन पूजा ही छतीसगढ़ की असली दीवाली है,,
घुरवा यंहा के वो प्राचीन उर्वरक कारखाने है जिनसे निकले गोबर खातू से यंहा का चावल दुनिया की सबसे सुगन्धित महक से महकता था और बारी ,थे,आदिम हार्टिकल्चर फील्ड ,,हमारे स्थानीय देव ,,देविया,,भी इन्ही संसाधनों की रक्छा प्राचीन काल से कर रहे है,, अरपा ,,पैरी के धार,,या मोर संग चलव जी जैसे गीतों के बोल,, उस आदिम प्रेम के रूप में आज भी आंखे गीली कर देती है,,ऐसे में अर्थव्यवस्था के आधुनिक प्रतीकों से भिन्न नरवा गरवा घुरवा बारी,,एक ऐसा विकास मॉडल है जो हमारे पर्यावरण के साथ हमे उठने में मदद करता है,,सतत विकास के उस वैश्विक संकल्पना से हमे जोड़ता है जो अन्धाधुन्ध,,संशाधनों के दोहन से भिन्न आने वाली पीढ़ियों को ध्यान रखकर सन्तुलन को अपना लक्छ बनाती है ठीक है कि पोरा की बैल जोड़ी की जगह ट्रेक्टर ने ली है पर हमारे विश्वास और इतिहास ,,के ही ये चार चिन्हारी अब एक नया प्रतिमान गढ़ेंगे,,
अनुभव